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Can we realize God being a householder!
Q: गुरुजी, आपने कहा था कि कोई ग्रहस्थी में रह कर भी उस परम परमेश्वर की प्राप्ति कर सकता है, पर अगर हम लोग ग्रहस्थी में रहते हैं तो मोह के जंजाल से कैसे छूट सकते हैं? आसक्तियाँ तो इसी संसार में लिप्त रहती हैं| और आपने यह भी कहा था कि अगर तुम उस ब्रह्म के दर्शन चाहते हो तो ये संसारिक मोह त्यागो, तो दोनो चीज़ें कैसे संभव हैं? और मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि यह मन आख़िर है क्या? यह दिल भी नही है और दिमाग़ भी नही| सही में है क्या यह मन, मेरा मार्ग दर्शन कीजिए, और क्या हम ध्यान में अपने इसी मन को जानते हैं? मैं ध्यान के लिए बैठता हूँ लेकिन मुझे पता नही कि उसमें सही में क्या करना है और क्या ढूँढ रहे हैं? यह सुना है कि हम अपने मन में रहने वाले परमात्मा को ढूँढ रहे हैं, मन बार बार विचारो में खो जाता है? पर इतना ज़रूर है कि एक शांति मिलती है ध्यान में बैठने के बाद|
A: दोनो चीज़ें इस तरह से संभव हैं कि आप जहाँ हैं वहाँ रहते हुए सब से पहले अपने आपको देह से, मन से, बुद्धि से अलग हूँ, अलग था, अलग रहूँगा, ऐसा निश्चय तुम्हारा बने| अब यह आत्म विश्लेषणात्मक निश्चय बनाने से भी पूर्व आपको थोड़ी और साधना करनी होगी और वो साधना क्या है? मन को एकाग्र और शांत रखना| आपकी इंद्रियों के जो भोग हैं उसके विषय में बहुत संयमित रहना, उतना खाना जितना आवश्यक है, उतना सोना जितना आवश्यक है, उतना बोलना जितना आवश्यक है|
ऐसे धीरे-धीरे अपनी इंद्रियों को साधना, फिर मन को साधना, अपनी वाणी को साधना, अपनी ज़रूरतों को कम करना, अपनी इच्छाओं को कम करना और यह हमेशा जानना कि आप अपने जीवन के उद्धारक हैं और इस संसार में जो कुछ आप देखते हैं, जो कुछ आप सुन रहें हैं, यह सब दिखने-सुनने वाला संसार मिथ्या है, टूट जाने वाला है और जिन इंद्रियों से देख रहें हैं वो भी टूटने वाला है, वो भी मिटने वाला है| इस निश्चय को आप जितना गहरा करते चले जाएँगे, बाहर की दौड़ अपने आप कम होगी और साथ ही साथ उतना ही आपको अंतर्मुखी होने के लिए जप करना और पूजा करना इत्यादि ये कर्म करते रहना चाहिए| फिर आप चाहे जंगल में रहो, गुफा में रहो, शहर में रहो क्या फ़र्क पड़ता है| आत्म जागरण की ज़िम्मेवारी को सर्वोपरि रखना और बाकी सब चीज़ों को दो नंबर पर रखना, तो ऐसा संतुलन आप बनाना|










