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Need of a living Master for spiritual growth

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Need of a living Master for spiritual growth

Q: प्रणाम गुरुमाँ, मैं ओशो को बहुत ध्यान से सुनता हूँ और उनका हर शब्द मेरे मन को काफ़ी भीतर तक झकझोर कर रख देता है, उसी तरह मैं आपको भी सुनता हूँ, आपके हर शब्द में प्यार, ममता ओर स्नेह है, और आपका ज्ञान मन में कई भाव पैदा करता है| माँ, परंतु मैने सुन रखा है कि गुरु केवल एक ही होना चाहिए मैं दुविधा मैं हूँ कि मैं आपसे दीक्षा लेकर अपनी यात्रा शुरू करूँ या ओशो का सन्यासी बनूँ| एक गुरु की तस्वीर जडित माला पहन कर अगर मेरा मन दूसरे संत के सतसंग में बैठने को करे तो क्या ये ठीक है माँ? और कृपया बताऐं कि माला दीक्षा क्या है? और क्या मैं बिना माला दीक्षा के या बिना सन्यास लिए सिर्फ सतसंग सुनकर ही अपनी मंज़िल तक नही पहुँच सकता?

A: देखिए सत्य एक ही था, एक ही है, एक ही रहेगा और सत्य का उद्घाटन भी एक ही है| पर उसके स्वाद अलग अलग होते है| ओशो का अपना एक स्वाद था, ओशो बहुत प्यारे, बहुत ही प्यारे संत थे| उनकी वाणी में ओज है, उनकी वाणी में आनंद है, उनकी वाणी में प्रेम है| पर एक बात याद रहे आज ओशो अपने शरीर में नही हैं यह ओशो का ही कहा हुआ वचन है कि जब मैं ना रहूं तो मेरे जैसे किसी बोध प्राप्त व्यक्ति को तुम मिलना, मेरे चित्र के साथ बँध कर किसी परम्परा का हिस्सा मत बन जाना| और अफ़सोस इसी बात का है कि आज वो ही हो रहा है| जिस चीज़ का ख़तरा, जिस चीज़ का भय ओशो ने स्वयं अपने शब्दों में दिया|

जब तलक सदगुरु जिंदा है तब तलक वो तुम्हारे लिए बहुत बड़ी क्रांतियाँ खड़ी कर सकता है| पर जिस दिन गुरु देह में ना रहे, बड़ा मुश्किल है उसकी तस्वीर से या उसके मात्र शब्द को सुनकर तुम आत्म जागरण को प्राप्त कर जाओगे| मन वास्तव में अहंकारी है, तुम को मुश्किल में डाल रहा है, इसलिए तुम को मरा हुआ गुरु प्यारा लग रहा है और जीवित गुरु के पास जाने में भी तुम्हे विलंब हो रहा है, देर लग रही है,| कौन जाए, कौन सुने, कौन समर्पण करे? अच्छा है ओशो को पढ़ते रहिए, ओशो की तस्वीर को घर में कहीं रखो और ओशो का जो सन्यास था वो सन्यास ऐसे भी बहुत मस्त किस्म का था| सिर्फ़ शिविर के काल में ही चोला माला पहनिए और उसके बाद आवश्यकता नही है| यह स्वयं उन्होने कहा और वो तो बहुत सारी बातें कहते थे कि पहनो और फिर सबके उतरवा दिए कि कुछ ना पहनो, आग लगवा दी|

तो ऐसे क्रांतिकारी गुरु के शिष्य अगर आप हैं तो आपको यह बात तो समझ ही लेनी होगी कि अगर एक हैंड पंप टूट जाय तो नये हॅंड पंप पर तो जाना ही होगा| पानी का स्त्रोत तो एक ही है, उसमे कोई फ़र्क नही है| परमात्मा एक ही था एक ही है, एक ही रहेगा| परंतु आपको हॅंड पंप मिलेगा तो उसको चलाएँगें तो उसमें से पानी मिलेगा, हॅंड पंप ही नही है तो पानी कैसे निकालेंगें? कोई तो स्त्रोत चाहिए, बाकी सुनते सुनते क्या मंज़िल तक नहीं पहुँच सकते? क्यों नहीं पहुँच सकते, परंतु तुम पहुँच गये हो या नहीं इसका निर्णय कौन करेगा और तुम ठीक से चले भी हो या नही या फिर बिना चले सिर्फ़ स्वप्न ही देख रहे हो कि मैं चल रहा हूँ और मैं साधना कर रहा हूँ और स्वप्न में ही समाधि हो गयी और स्वप्न में ही लगे कि अच्छा अब तो मुझे ब्रह्म का बोध भी हो गया, और इतने में आँख खुल गयी तो पता चला कि अरे यह तो सपना था| मन डरता है, मन जीवित व्यक्ति को सदगुरु स्वीकार करने में बहुत डरता है इसलिए वो मरे हुए गुरुओं के साथ समझौता करने में ज़्यादा समझदारी महसूस करता है| सो आप वो करिए जो आपका दिल कहे पर काश आप दिल की आवाज़ को सुन पाएँ, दिमाग़ की कचर पचर को नहीं|