Q : मैं पिछले चार-पाँच सालों से नित्य नियम से जप, ध्यान, साधना कर रहा हूँ, पर अभी भी मुझ में सजगता नहीं आ पाई है. इस बात का एहसास भी मुझे मेरे मित्र ने कराया कि मैं बेहोश हूँ. मुझ में सजगता की कमी है. अगर इस बात का कारण हम खुद ही पता ना लगा पाएं, तो इतनी बड़ी कमी को हम कैसे दूर करें? मैं कहाँ ग़लत हो रहा हूँ और मैं आगे क्या करूँ कि मेरी बेहोशी टूटे और सजगता बढ़े?
नरेश
Answer मैं कहूँगी तुम अच्छे हो कि तुम्हारे पास एक ऐसा मित्र है जो तुमको तुम्हारी कमी और बेहोशी का एहसास करा पा रहा है| सच तो यह है कि हम अपने अंदर अहंकार को इतनी बड़ी जगह दे बैठे हैं और यह मानने को ही तैयार नहीं हैं कि हम से भी कुछ ग़लती हो सकती है, हम यह स्वीकार ही नहीं करना चाहते हैं कि हम कुछ बेढंगा भी कर सकते हैं|
पर सच तो यह है कि बेढंगापंन तो तुम्हारे मन के अंदर घुसा हुआ है. और बेढंगे मन से तुम कुछ भी करोगे, वो ग़लत ही होगा, वो सही हो ही नहीं सकता| जैसे गंदे कपड़े से तुम डस्टिंग करने लग जाओ, तो गंदगी सॉफ नहीं होगी, गंदगी और बढ़ जाएगी, यहाँ की चिकनाहट वहाँ, वहाँ की धूल वहाँ, वहाँ की कालिक वहाँ, तो आपने उसको और फैला दिया|
जो आपका मन स्थिर नहीं, जो आपका मन बेढंगा है, तो बेढंगे मन से कुछ भी सही नहीं हो सकता|
और अपनी बेहोशी को पकड़ पाना और उस बेहोशी से बाहर आना ही तो साधना है| धीरे-धीरे, धीरे-धीरे इसका विकास होता है. आज बच्चा पैदा हुआ, आज ही तो वो छ: फुट लंबा नहीं हो जाएगा| रोज़ छ: मि. मीटर शायद बढ़ेगा, रोज़ धीरे-धीरे बढ़ेगा| ऐसे ही अपनी चेतना को धीरे-धीरे विकसित करना पड़ता है और यह तुम तीन -चार साल ऐसे लिख रहे हो जैसे तीन-चार जन्म लिख रहे हो|
क्या होता है, तीन-चार साल? जितना अज्ञान का अंधेरा आप अंदर लेकर घूम रहे हैं, उसके लिए तीन-चार साल कुछ भी नहीं होते, यह बहुत थोड़ा वक्त है, बहुत कम वक्त है|
गुरुमाँ