Girls still awaiting sponsorship: 657  |   Funds Required: USD 134,655   |   Funds raised so far: USD 15,345

ध्यान में प्रभु या संगत का आधार लेने से हम निराधार कैसे बनेंगे?

Q : सुखमनी :- " प्रभ का सिमरन साध के संग" इस वचन ने सत्संग करने वालों को बहुत प्रोत्साहन दिया है| संगत के साथ आनंद भी बहुत आता है, पर ध्यान या साधना अकेले करने पर वह तृप्ति नही आती जो संगत के साथ आती है| यह भी महसूस होता है हमें किसी का भी आधार नही रखना है, यहाँ तक की गुरु का भी आधार नही होना चाहिए| पर जब ध्यान में हमें आधार अच्छा लगता है, तो हम निराधार कैसे होंगे ?

हरि ओम



Answer

हरि ओम, आप बहुत ज़ोर से उलझे हुए हैं| यह आप नहीं समझ रहें हैं "प्रभ का सिमरन साध के संग", यहाँ साध का अर्थ group of people नहीं है| यह की दस या बीस, या सौ या दो सौ लोग बैठ के एक साथ पाठ पढ़ रहें हैं, यह साध संगत हो गई, ऐसा बहुत से लोग मानते हैं| पर साध शब्द हिन्दी भाषा के साधु शब्द से है, साधु मतलब जो साधना करता है|

तो इस पंक्ति का वास्तविक अर्थ ये है, जो तन, मन से परमात्मा के प्रेम में रंगा हुआ है, ऐसे साधु के साथ बैठ के सुमिरन करो| अब साधु शब्द का अर्थ ही अगर दूसरा किया जाए, कि संगत को आपने साधु बना दिया| साधु और संगत ये दो शब्द हैं, साधु की संगत में बैठ कर के करो, लोग उसे कहे देते हैं "साध संगत" अब वो साध संगत का अर्थ ही जब बदल गया, तो निश्चित ही फिर जो आपको ठीक लगे, सो आप करिये|

गुरुमाँ

Views: 1,019

Tags: , , ,

Videos Related to above Question