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क्या मृत्यु उपरांत किए जाने वाले कर्म-कांडों के पीछे कोई तर्क-संगत कारण है?

Q : पूजनीय गुरुमाँ, मृत्यु उपरांत अनेक कर्म काण्ड होते हैं जैसे दस्वा, बरावा आदि| और ऐसी मान्यता है कि घर की बहू को घर के मंदिर में कोई भी पूजा करने की इजाज़त नहीं है, क्योंकि वह अपवित्र होती है| ऐसे ही कई अन्य अजीब से रीति रिवाज़ों का पालन किया जाता है| मुझे इन सबके पीछे कोई तर्क-संगत कारण नहीं दिखता| कृपया मार्गदर्शन करें|

स्नेहलता लालपूरिया



Answer स्नेहलता, जब दुनिया समझती नहीं है, तो अपनी बेसमझी से वो अपने आसपास ऐसे ताने- बाने बुन लेती है जिसमे वो खुद ही फँस जाती है| सोचने की बात है कि जिस घर में मौत हुई हो, वे बहुत दुखी हैं, सब रो रहे हैं, परेशान हैं, असहाय हैं, घबराए हुए हैं| मौत आ गयी ना घर में, मौत को तो कोई स्वीकार करता नहीं है, मौत को कोई चाहता नहीं है और घर में आ जाए तो मातम छा जाता है|

तो ऐसे में उन लोगों को उनकी शोकग्रस्त अवस्था से बाहर निकालने के लिए हुमारे पूर्वजों ने कुछ ऐसे तरीके बनाए, जिससे आदमी का मन उस मरे हुए इंसान के बारे में सोचने की बजाए, आज वर्तमान में क्या क्या कर्म हैं, वो उन सब चीज़ो में व्यस्त हो जाए| तो कुछ अपने दुख को भूल ही जाएगा| जैसे पुराने समय में ऐसा कहा जाता था की ‘गरुड़ पुराण’ का पाठ कराईए| अब ‘गरुड़ पुराण’ क्या है? सब कथा मृत्यु की है| जितने लोग पड़ेंगे या सुनेंगे, तो उन्हें यह सिखाया जा रहा होता है, जो मर गया उसके लिए मत रो| तू भी मरने वाला है| तो जब हमने भी मर जाना है तो जो मर गया है, चला गया है, उसके लिए दुख थोड़ा कम हो जाता है|

लेकिन फिर इसी में पंडितों की खुराफाती आ गयी, तो उन्होने उस मरे हुए व्यक्ति के नाम पर यह दान करो, अन्न दो, कपड़ा दो, यह करो, वह करो, इन सब का जाल फैला दिया| मौत से डरे हुए आदमी को जो पंडितजी बोल दे,वह सब करने को तैयार हो जाता है| एक बड़ी अच्छी ख़ासी दुकान जो है, वह जम जाती है|

जो डरता है अपनी मौत से और घर में हुई मौत से, वह इन सब रीति रिवाज़ो को सर झुका कर के पूरा कर देता है, क्योंकि डर लगता है| अभी मैं किसी का पत्र पढ़ रही थी, तो उन्होने लिखा कि हमारे पिताजी मर गये और हमने उनकी याद में जागरण कराया, और जागरण में वे मुझको साक्षात सामने खड़े दिखे और वे बड़ा रो रहे थे और उन्होने कहा मैं तुम लोगो से बहुत ममता करता हूँ इसलिए मैं तुम्हे छोड़ के नही जा सकता हूँ, तो मुझे बड़ा तरस आता है, मैं उनको देखती हूँ, वे मुझे दिखाई देते है| पहले मैं आत्मा मानती नही थी, अब मैं आत्मा मानती हूँ, हे भगवान आत्मा इसको कहते नहीं हैं, तो किसको आत्मा मानूँगी|

दिमाग़ खराब हैं लोगो के| शायद एक छोटे से एलेक्ट्रिक शॉक की ज़रूरत है| दिमाग़ चलने लग गया है| खुली आँख से चीज़े दिखने लग गयी हैं| शायद आप लोग टी.वी. सीरियल ज़्यादा देखते हो भूत पिशाचों के| तो तुम्हारा ही बाप मरा हुआ अगर तुम्हें दिख भी रहा है तो इसमे दुख वाली क्या बात है? पर दुखी भी हो रहे हैं तो जागरण कराते रहते हैं| जागरण भी चल रहा है और पिताजी का भूत भी घर से नहीं जा रहा है| फ़ायदा क्या हुआ, फिर जागरण बंद कर दो| पिताजी के साथ सैटिंग कर लो, कोई बात नहीं पिताजी, आप मरे हुए हो, फिर भी यहीं रह लो| नो प्रॉब्लम, बल्कि फ्री में घर की रक्षा करेंगे| कोई आ जाए चोर या डाकू तो भूत बन बन के डराएँगे| फ्री में आपको सेक्यूरिटी मिल रही है, और क्या चाहिए? मुश्किल यह है लोगो के पास बुद्धि नहीं है, और जिसके पास बुद्धि नहीं होती है, उसको बुद्धू कहते हैं|

तो जब आप बुद्धू हैं ही तो आपको बुद्धू बनाने वाले और दस लोग आ ही जाएँगे| लेकिन यह जो रस्म रिवाज़ होते थे, बुनियादी तौर पर उसका लक्ष्य यह होता था, कि घर वाले बैठ कर के रोये नहीं, शोक नहीं मनाएँ| तो कोई ग्रंथ पढ़े, कोई जप करे, तो मृत्यु के उस दुख और शोक से बाहर आ जाएँगे| लेकिन पूजा पाठ के नाम पर पंडित बुला लिया जाता है| और पंडित क्या आल तू, जलाल तू, आई बला को टाल तू, मंत्र बोले जाएगा| ना तुम्हे समझ लगती है, ना उसको समझ लगती है|

कुछ एक ब्राह्मणों को मैनें देखा है, वे अपनी किताब खोले बिना मंत्र नहीं बोल सकते, उनकी किताब छीन कर ले जाइए बीच में, जब वह पाठ कर रहा हो, क्या करेगा वो …… ऐसे उधार का पाठ पूजा करने वाला कर्म-कांडी, जिसपर तुम्हे श्रद्धा है, डरते हो, उसको घर बुलाते हो,सब कुछ करते हो| हिम्मत करते हो, तो मत करो| समझते हो मौत को तो मौत से भय नहीं किया जाता, उसको समझा जाता है| कोई मर गया है घर में, तो उसकी मौत के बहाने जीवन के अनिश्चित और मरण-हारा होने को समझे, और अपने जीवन का भी मूल्य समझे| चिंतन हो तो समझ भी लगती है|

गुरु माँ

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