क्या कुम्भक प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है?

Q : क्या कुम्भक प्राणायाम कभी भी किया जा सकता है? खाने के तुरंत बाद या खाने के तुरन्त पहले इसे किया जा सकता है? माँ मैं अपनी तरफ से पूरी कोशिश करती हूँ अपने दैनिक कार्यों में हमेंशा कोई ना कोई मन्त्र जप करने की, पर मैंने यह अनुभव किया है कि जप चूँकि मानसिक रूप से होते हैं तो मन जप करते-करते कब दूसरी तरफ चला जाता है पता ही नहीं चलता. पूर्ण रूप से जागरूक रह कर पूरा दिन मानसिक जप करते रहने के क्या उपाय हैं? सारी इंद्रियों के दरवाजे को बंद कर उन्हे अंदर की तरफ मोड़ने के लिए क्या करना चाहिए?
अंजली



Answer

अंजलि, पहली बात तो यह है कि कुम्भक को शुरू करने से भी पूर्व कम से कम एक वर्ष तक नियमित योग का अभ्यास होना चाहिए और उसी के साथ-साथ कम से कम एक साल तक अनुलोम विलोम जैसा नाड़ी शोधन, प्राणायाम यह आपका बहुत सुंदर से हो रहा हो| आप एक घंटे प्राणायाम को सुबह और शाम में कर सकें और साथ ही साथ आसनों का अभ्यास चलता रहे, आहार आपका सात्विक हो, सोने का समय आपका तय हो, जागने का समय निश्चित हो, तो इतनी तैयारी आपकी जब तलक न हो तब तलक कुम्भक को शुरू करना यह समझदारी नहीं होगी|

दूसरी बात यह है कुम्भक हमेंशा अंदर से शुरू करना चाहिए पर कुम्भक के विषय में और अधिक कहना मैं अभी उचित नहीं समझती हूँ| आप को मैंने जैसे कहा आप उतना करिए और हो सके तो हमें मिलिए और आप एक डेयरी maintain करिए, जिसमें आप रोज का रोज routine लिखें, आपकी दिनचर्या, आपने कितनी देर आसन किए, कौन-कौन से आसन किए और करने से भी पहले सीखना पड़ेगा कि करना ही कैसे है? यह ना हो की आप ग़लत आसन कर-कर के शरीर ही खराब कर लें|

तो आसनों को सीखिए, अभ्यास कीजिए, प्राणायाम, अनुलोम, विलोम, नाड़ी शोधन को करिए यह बहुत लाभकारी है| अगर इतना हिस्सा आपने बराबर एक वर्ष तक कर लिया तो कुम्भक के विषय में अगली जो जानकारी है वो आपको आमने-सामने देंगे| दूसरी बात आपने पूछी है जप के विषय में, जप में मन का इधर-उधर चला जाना दो बातों का संकेत है, एक आपका मन बिखरा है| दूसरा, आप पूरी एकाग्रता से अपने मंत्र पर दृष्टिगोचर नहीं हो रहे हो|

तो पहले तो उसी कारण को ठीक करना होगा, कारण ढूंढीए क्यों आपका मन यहाँ-वहाँ जा रहा है, ज़रूर कहीं ना कहीं राग-द्वेष बनाए हैं, किसी से गुस्सा है, किसी से नाराज़गी है, या आशाओं के कुछ पंख लगा रखें हैं मन को, जिसकी वजह से मन उड़ना चाहता है| तो जो उड़ना चाह रहा हो उसको एक जगह में बैठाना तो मुश्किल हो जाएगा| तो अपनी इच्छाओं के उपर अंकुश लगाना सीखिए, दोस्तियाँ- दुश्मनी कर के हम सिर्फ़ समय बर्बाद करतें हैं| जब मिले कोई दोस्त तो प्यार कीजिए और मिलजाए कोई शत्रु कोशिश कीजिए सम्बन्ध बहुत ज़्यादा कड़वे ना हो जाएँ और उस परिस्थिति से बुद्धिमता पूर्वक निकल जाइए, मन में कुछ गाँठ नहीं बांधनी चाहिए|

जिनके मन खुले हैं उन्ही का मन जप में लग सकता है और उन्ही का मन चोबिसों घंटे जप में प्रवेश भी हो सकता है|

गुरुमाँ

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