क्या क्षमा करना, एक कमज़ोर व्यक्ति का लक्षण है?
Q : हम कैसे उस व्यक्ति को क्षमा कर दें, जो हमसे क्षमा माँग भी नहीं रहा| जो इतना अहंकारी है, कि वो अपनी ग़लतियों के बावजूद, हमको एक चुभने वाली मुस्कान देता है और ऐसा व्यक्ति जो दिन रात, मेरे मन को परेशान करता है| क्या क्षमा दे देना मनुष्य की कमज़ोरी है? या उसकी अक्षमता कि वो अपने आपको बचा नहीं पाता है, इसलिए वो दूसरो को क्षमा कर देता है?
-अमित शर्मा
Answer मानवीय मन की बात बड़ी अद्भुत है| हम एक तरफ तो तकलीफ़ महसूस करते हैं, कोई हमे परेशान करे, कोई हमे दुखी करे, कोई हमारी ज़िंदगी में मुश्किलें खड़ी करे, कोई हमे ताने कसे| कोई हमे दुखी करने के लिए जानबूझ के कुछ न कुछ ऐसा करे कि जिससे हमारे संतुलन में, हमारे मनोसंतुलन में दिक्कत आती हैं| एक तरफ तो हम दुखी हैं कि दूसरे ने मुझे दुखी किया, और उस पर हम इस दुख के घाव को कुरेदते रहते हैं| आप समझदार हैं, अगर किसी के घाव हो जाए, तो उस घाव को फिर छेड़ा नहीं जाता| छोड़ दिया जाता| अगर अपने घाव को आप छेड़ते रहेंगे तो आपका घाव बढ़ जाएगा, नासूर बन जाएगा और आपके लिए असहनीय पीड़ा और कष्ट को बढ़ा देगा| आप मुझ से पूछते हैं कि मैं किसी से दुखी हूँ, परेशान हूँ और क्या मैं क्षमा कर दूँ उसको, क्योंकि 'क्षमा बड़न को धर्म है'| तो अपना बड़प्पन दिखाने के लिए उसको क्षमा कर दूँ| और आपकी तो दूसरी भी तकलीफ़ है कि सामने वाला व्यक्ति आपसे क्षमा माँग भी नही रहा है| तो जो क्षमा माँग भी नही रहा है, उसको मैं क्षमा कैसे करूँ! परिस्थिति तो बड़ी गड़बड़ हो गयी| वो क्षमा माँग नही रहा है, और आप क्षमा दे नहीं पा रहे| और इसी वजह से अब आप दुगने दुखी हो रहे हैं| पहले इसलिए कि उसने आपको परेशान किया, और अब इसलिए कि ग़लती भी करता है और माफी भी नहीं माँगता है| तो माफी तो माँग ताकि मैं क्षमा देकर बड़ा बन सकूँ| अमित, आप अपने मन के इस चक्रव्यूह में फँस गये हैं, और जब तक इस चक्रव्यूह से निकलेंगे नहीं, सामने वाला क्षमा माँगे, इसकी करते रहिए इंतज़ार और होते रहिए दुखी और मान लीजिए किसी प्रभाव में आकर, किसी समकक्ष व्यक्ति के दबाव से वो व्यक्ति आपसे माफी माँग भी ले| आप शायद शब्दों से कह भी दें कि, "जा! मैने तुझे माफ़ किया!" देखिए कितना मज़ा आता है न ये 'जा' कहने में| और आप अपने उस मज़े की कमी महसूस कर रहें हैं; कि वो तकलीफ़ दे रहा है और आप तकलीफ़ को, अपने इस पीड़ा को और कुरेद रहें हैं, और कुरेद रहें हैं,| मैं आपसे पूछती हूँ, आप अपने इस दुख के घाव को कुरेदते रहेंगें, तो क्या आप स्वस्थ हो जाएँगे , तो क्या आप पीड़ामुक्त हो जाएँगे| और इंतज़ार अगर करते रहे कि वो मुझसे क्षमा माँगे और मैं क्षमा दूँ और ये अध्याय समाप्त हो जाए, वो भी नहीं हो रहा है और आप तब भी पीड़ित हो रहे हैं| मैं एक दूसरी स्थिति कहती हूँ| मान लीजिए वो व्यक्ति आप के सामने आकर माफी माँग भी ले, आप कह भी दें, कि हम भी भूल गए और तुम्हे माफ़ किया| क्या इससे आप उस समय की भरपाई कर पाएँगे जो समय आपने व्यर्थ किया? जो समय आपने पीड़ित हो हो करके, दुखी हो हो करके नष्ट किया है, क्या उस लंबे समय को आप उलट करके फिर वापस ला सकेंगें? और अगर उत्तर 'नहीं' है, तो क्षमा दो या ना दो , वो आदमी क्षमा माँगे या ना माँगे, आप स्वयं ज़िम्मेदार हैं अपने जीवन को दुख, पीड़ा और कष्टदायी विचारों से भरने के लिए| तो जब आप स्वयं ही स्वयं को दंडित किए जा रहें हैं, तो ऐसे में दूसरा व्यक्ति, कोई भी हो, आपकी मदद नहीं कर सकता| मैं उम्मीद करती हूँ क़ी आप इस बात को समझे और आपकी समझ को गहरा करने के लिए मैं एक कहानी कहती हूँ|
एक बार सिद्धार्थ गौतम बुद्ध एक जंगल में से निकलते हुए एक गाँव की सीमा तक पहुँचे| आपका शिष्य आनंद, आपके साथ था| दोनो सधे हुए होशपूर्ण कदमों से अपनी आनंदमयी छटा को चारों ओर बिखेरते हुए, ये शांति के दूत, जैसे ही इस गाँव की सीमा मे प्रविष्ट हुए, एक भीड़ का सामना करना पड़ा| और इस भीड़ के सब लोग, जाने क्यों, बुद्ध से बड़े नाराज़, गालियाँ देते हैं, अपमान करते हैं; कुछ एक तो बोले, "इनको मारो!" कुछ लोग तो बोले, "इनको मार मार के यहाँ से भगा दो|" कोई भीड़ मे से आवाज़ आ रही थी, "इनको ज़िंदा ही मत छोड़ो|" और आनंद तो हतप्रभ रह गए| आनंद समझ ही नहीं पाए ऐसा हो क्यो रहा है| और इस भीड़ मे से फिर एक व्यक्ति सामने आया| और उसने पहले तो बुद्ध को खूब गालियाँ कहीं, खूब उनका अपमान किया और फिर उसने बुद्ध के मुँह पर थूक दिया| अब इस अपमान को आनंद कैसे झेलता| आनंद क्रोध में लपट कर आगे आए| पर बुद्ध ने संकेत दे दिया, रुक जाओ, ठहर जाओ| बुद्ध शांत रहे, बुद्ध कुछ बोले नहीं| जब भीड़ चिल्ला रही हो तो ऐसे मे बोलना ऐसे भी व्यर्थ है, क्योंकि कोई सुन ही नहीं रहा है| और फिर किंचित् उचित समय देखकरके बुद्ध ने इस व्यक्ति से कहा, जो भीड़ का मुखिया था कि क्या आपको कुछ और भी कहना है, या कि मैं चलूँ?" आदमी को आप गालियाँ देदो, कोई प्रतिक्रिया न करे; फूँक दो, वो फिर कोई प्रतिक्रिया नहीं कर रहा, उल्टे ये पूछ रहा है कि कुछ और कहना है, कुछ और करना है, कि मैं जाऊँ! भीड़ ने रास्ता दे दिया| बुद्ध आगे-आगे, आनंद उनकी परछाई बनकर उनके पीछे पीछे चलने लग गये और बुद्ध यूँ चल रहें हैं जैसे कुछ हुआ ही नहीं| न मन मे कोई क्षोभ, न मन मे कोई विक्षेप, न मन मे कोई तनाव कि मेरा अपमान हो गया या इन्होने मुझे गालियाँ क्यों दी या वो पूछें उनसे कि आपने ऐसा कठोर व्यवहार हमारे साथ क्यों किया, हम तो भिक्षु थे, किसी को कष्ट नहीं दिया और फिर इतनी घृणा क्यों? कोई प्रश्न नहीं| बुद्ध चुपचाप चलते रहे लेकिन आनंद तो क्रोध में उबल रहे थे| जैसे ही इस गाँव से थोड़ी दूरी तक पहुँचे तो आनंद ने राह रोक ली| आगे बढ़ करके बुद्ध से प्रश्न पूछा कि "आपने मुझे उन लोगो से लड़ने पर क्यों मना किया| मैं एक क्षत्रिय हूँ और मेरे सामने कोई आपका अपमान करे, मैं कैसे बर्दाश्त करूँ| आपने क्यों मुझे रोका? मेरी भुजाओं में आज भी इतना बल है, कि में निहत्था इन सबको वो मार मारता कि ये भी याद रखते| वो क्या समझते हैं, मैं भी भिक्षु ही हूँ क्या? मैं तो क्षत्रिय हूँ!" बुद्ध हँस दिए और पूछते हैं आनंद को कि, "पहले तो ये तय कर ले कि तू भिक्षु है या तू क्षत्रिय है| क्योंकि अगर तू क्षत्रिय है, तो फिर तू अभी भिक्षु नहीं है, और अगर तू भिक्षु है तो फिर तेरे जीवन और मन में ये क्षत्रिय धर्म, ये लड़ने और मरने का जो जज़्बा है, ये आना नहीं चाहिए था| तो ग़लती तेरे में है| तो इस पर विचार करो| एक क्षण विचार करो और मुझे उत्तर दो- क्या तुम भिक्षु हो या क्षत्रिय? और तुम कौन हो"? तो आनंद थोड़े से ठंडे हुए और उन्होने कहा,"हूँ तो मैं भिक्षु, पर क्या करूँ? मेरे सामने मेरे गुरु का, मेरे सदगुरु का अपमान, कोई आप के मुँह पर थूके और मैं कुछ करूँ भी नही! अभी मैं इतना शांत और धीर-गंभीर नहीं हुआ हूँ, अभी मैं इतना विद्वान नहीं हो गया हूँ कि मैं कुछ प्रतिक्रिया न करूँ| बुद्ध ने कहा अब शांत हो करके मुझे सुनो| पहली बात- अगर तुम क्षत्रिय थे भिक्षु होने से पहले, तो क्या तुम भूल गये कि मैं भी एक क्षत्रिय था और याद रहे, मैं तो राजकुमार था, और सत्ता का, और शासन करने का, और लोगों को दबाने का, और कुचलने का और जो चाहूँ वो करने का मादा क्या मुझमे नहीं है, क्या जीवन भर मैने यही नहीं किया था, दूसरो को आदेश देना- ये करो, ये नहीं करो, ऐसा होगा, ऐसा नहीं होगा, क्या या सब मुझमे नहीं था? लेकिन जब मैने महल छोड़ा, राजकुमार की पदवी छोड़ी, गृहस्थ को छोड़ा और फिर भिक्षु के वस्त्र लिए, उस दिन से मैने दूसरो को आदेश देना-दूसरे ये करें ,या ये न करें, इस प्रकार की आज्ञा देना मैने उसी दिन त्याग दिया था| अब एक बात को समझो| मेरे साथ रह रहे हो, भिक्षु हो तो भिक्षु का धर्म क्या- उसको जो मिलता है, वो उसे स्वीकार करता है| आज से पहले लोगों ने सम्मान किया, घरों में बुलाया, भोजन कराया वस्त्र दिए, क्या हमने वो स्वीकार नहीं किया? और आज, हमें भिक्षा में गालियाँ मिली, डाँट मिली , अपमान मिला, थूक मिली, भिक्षु कैसे माना कर सकता है कि मैं ये लूँगा, ये नहीं लूँगा| भिक्षु हम उसीको कहते हैं जो सब कुछ स्वीकार करता है- ज़हर हो कि अमृत, फूल माला हो कि गालियाँ हो; वो सब कुछ स्वीकार करता है| और ऐसी स्वीकृति जो करने का मादा रखता है, ऐसा जज़्बा, ऐसी सहनशीलता, ऐसा अनुमोदन जिसके अंदर होता है, उसीको तो भिक्षु कहा जाता है| सो उन लोगों ने मुझे गालियाँ दी, थूक दी, और मैने वो सब कुछ स्वीकार कर लिया तो तुमको कष्ट क्यों हुआ? तुमको क्यों परेशानी हुई? नहीं होनी चाहिए थी! भिक्षु का ये धर्म नहीं है| विक्षिप्त होना भिक्षु का धर्म नहीं है| और दूसरी बात , आनंद , जब वो क्रोधित हो करके मुझ पर गालियाँ निकाल रहे थे, तो सत्य तो यह है कि मेरे हृदय में उनके प्रति अपार करुणा आ रही थी| कारण क्रोध की अग्नि वो अपने मन में जला कर बैठे हैं, क्रोध की अग्नि से सिके जा रहे हैं, जल रहें हैं, तड़प रहे हैं, पीड़ित हो रहें हैं| और जब कोई पीड़ित हो, तड़प रहा हो, दुख में हो, जल रहा हो, तो ऐसे में हम भिक्षुओं का क्या कर्तव्य है, कि हम उनके प्रति क्रोध दिखाएँ या हम उनके प्रति करुणाशील हो जाए? आनंद कुछ देर मौन रहे, सोचे और फिर उत्तर दिया- " निश्चय ही हमे ऐसे पीड़ित व्यक्ति के प्रति करुणाशील होना चाहिए|" बुद्ध ने कहा, "बस मैं वही कर रहा था! और तुम भूल गये अपने भिक्षु धर्म को| वो तो जल ही रहे थे साथ में साथ तुम भी जलने लग गये| ये समझदारी न थी| ये तुम्हारा धीरता और शीलता का उचित प्रदर्शन नहीं था|" कहते हैं कुछ महीनों के बाद, बुद्ध वैशाली में विहार कर रहे थे और बहुत से दर्शक, बहुत से श्रोता उनका दर्शन करने आए थे| और इस भीड़ में से एक व्यक्ति सबको चीर के आगे आया और भगवान बुद्ध के चरणों पर गिर गया और ज़ार ज़ार रोने लग गया और बार बार एक ही बात कहे- मुझे क्षमा कर दें, मुझे क्षमा कर दें, मैने घोर अपराध किया, मुझे क्षमा कर दें| बुद्ध ने अपने बड़े शीतल स्वर से उस व्यक्ति को कहा- "कौन हो और किस बात की क्षमा मुझसे माँग रहे हो? उसने रोते हुए सर उठाया और बुद्ध को देखते हुए वो कहता है," मैं वही नीच हूँ, मैं वही पापी हूँ, जिसने आपको गालियाँ दी थी, जिसने आपके मुँह पर थूका था, और मैं समझ नहीं पा रहा हूँ, कि मेरी बुद्धि इतनी कैसे बिगड़ गयी| मैने ऐसा दुष्कर्म कैसे कर दिया| आप जैसी महान विभूति, आप जैसे महापुरुष के प्रति जो पापाचार मैने किया है, उसके लिए मुझे क्षमा दे दीजिए|" बुद्ध मुस्कुराए और कहते, "कैसी क्षमा! कैसी क्षमा! वो व्यक्ति जिसने मुझे गालियाँ दी थी, मेरे सामने इस समय पर वो व्यक्ति अभी नहीं बैठा है| और जिससे तुम क्षमा माँग रहे हो, ये बुद्ध भी, वो बुद्ध नहीं है; बदल गया| हर क्षण हमारे शरीर में परिवर्तन हो रहा है| रस प्रक्रिया चल रही है, केटाबोलिस्म , एनाबोलिस्म चल रहा है| जीव कोश मर रहे हैं, नये पैदा हो रहे हैं, नाख़ून उगते हैं , बाल उगते हैं| ये तो मोटे तौर पर हम परिवर्तन देखते हैं, लेकिन तुम्हारे शरीर के अंतर कितना गहरा परिवर्तन हो रहा है| छः महीने में रक्त पूरा बदल जाता है| हड्डियों में भी सब परिवर्तन हो रहा है, बालों में परिवर्तन हो रहा है| हमारे पूरे शरीर के एक एक हिस्से में हर क्षण में परिवर्तन हो रहा है और इसी परिवर्तनशीलता के कारण, हम ये नहीं कह सकते कि छः महीने पहले हम जिस व्यक्ति को मिले, वो ही व्यक्ति आज भी मेरे सामने है| समय ने, प्रकृति ने शरीर को बदल दिया| समय ने मन को भी बदल दिया| तेरा वो मन आज कहाँ, कहाँ गया वो मन जो गालियाँ दे रहा था! कहाँ गया वो मन जो मुझे जान से भी मार सकता था| कहाँ गया वो मन, जिसने मुझपर घृणा-वश थूका था, तुम्हारे पास आज वो मन नहीं हैं; तुम्हारा वो मन है ही नहीं जिसने ये अपराध किया था| मेरे सामने जो व्यक्ति बैठा है, बुद्ध कहते, वो व्यक्ति शांत है, पश्चाताप की अग्नि में जलकर कुंदन हो रहा है, जिसके मन में भावना जगी है, एक सुंदर मन सृजित करने की| जिसके अंतर भावना है, संत के प्रति, गुरु के प्रति, बुद्ध-पुरुष के प्रति श्रद्धा है जिसके मन में; तो तुम तो एक श्रद्धावान् व्यक्ति हो, और ऐसे श्रद्धावान् व्यक्ति को तो मैं आशीष देता हूँ| मुझे नहीं याद पड़ता है, कि तुमने क्या अपराध किए, मैं उस बीते समय को नहीं जानना चाहता हूँ| मैं उस बीते हुए व्यक्ति को आज वापिस कहाँ से लाऊँ, जिसे मैं माफ़ कर सकूँ| आज जो मेरे सामने है वो ऐसा व्यक्ति है, जो अहंकाररहित हो करके, ज्ञान का मार्गदर्शन चाहता है; पेम, दया और करुणा का पात्र है और मैं वही तुमको दे सकता हूँ|
अब सोच करके देखिए, विचार करके देखिए| बुद्ध की स्थिति को अपने ऊपर लागू करके देखिए| कोई आपको गाली दे, कोई आपके मुँह पर थूक दे, आपकी प्रतिक्रिया क्या होगी? पहली तो वही होगी, जो आनंद की थी| जिसने भोहे चड़ा ली थी और मार कुटाई करके, और गाली गलोच करके, वो ईंट का जवाब पत्थर से दे देते| पर कभी कभी ऑफिस में काम करते हुए या रिश्तेदारी में, आप उस व्यक्ति को पीट नहीं सकते हो आप उस व्यक्ति को कुछ बुरा भी नहीं कह सकते हो, क्योंकि आपकी जो जगह है, वो बहुत शक्तिशाली नही हैं और आपको उस काम की या उस रिश्तेदार की अभी ज़रूरत है, इसलिए भी आप कुछ नहीं कह पा रहे हैं और ऐसी मजबूरी में उस अपमान को, उस कष्ट को झेल लेते हैं और शायद ये कहकर के कि धीरज धार लूँ, कोई बात नहीं, मैं चिंता न करूँ, कोई बात नहीं, लेकिन अपमान की उस पीड़ा को तुम भुला नहीं पाते हो और इसी कारण से आप दुखी भी हैं, आप पीड़ित भी रहते हैं, और आपकी पीड़ा का कारण वह व्यक्ति नहीं हो सकता है| आपकी पीड़ा का कारण आपका अपना अज्ञान है, आपकी पकड़ है, आपकी ये चाहना कि तुमको कोई बुरा कहे नहीं| आपकी ये चाहना कि तुमको कोई सताए नहीं, आपकी ये चाहना कि सब तुमको महान् बोले और तुम्हारे आगे पीछे डोलते रहें, जो कि होने नहीं वाला| याद रखिए, जब आप किसिको क्षमा करते हैं, अब वो बंदा आके क्षमा माँगें, ये ज़िद भी ठीक नहीं, ये ज़िद भी उचित नहीं| क्योंकि जिस व्यक्ति ने तुम्हारी बेइज़्ज़ती की है, यदि वह एक विवेकपूर्ण व्यक्ति होता, तो वो व्यक्ति तुम्हे परेशान करता ही क्यों! और केवल एक विवेकपूर्ण व्यक्ति ही क्षमा माँग सकता है| जिसके अंदर तोड़ा सोच समझ का मादा होगा, वही तो अपनी ग़लती देखेगा, समझेगा और क्षमा माँगेगा| जिसको इस चीज़ का एहसास नहीं है, वो तो दूसरे को सताता ही रहेगा दिन रात| वो नये नये निशाने ढूँढ लेता है, उनको मज़ा आता है| दूसरों को जो सताने में अपना मज़ा ढूँढ़ते हैं, ऐसे दुष्ट व्यक्तियों से ये अपेक्षा करना, कि आके वो आपसे क्षमा माँगे, पहली तो ग़लती ये है| दूसरे, बुद्ध के दृष्टिकोण से हम देखे, जो स्वयं क्रोध से पीड़ित है, जो स्वयं दुखी है, वो अपने मन के अंदर पल रहे दुख और पीड़ा को ही तो दूसरों को देता है| हमारे पास जो होगा, दूसरे को हम वही देंगे| अगर हमारे पास पीड़ा है, हम दूसरों को पीड़ा देंगे; हमारे पास दुख है, संताप है, हम दूसरे को दुख और संताप देंगे| हमारे पास आनंद है, हमारे पास खुशी है, हमारे पास गीत है, संगीत है, नृत्य है, हम दूसरों को वही दे देंगे, और हम अगर अपने इस जीवन को इस भावना से भर दें कि मैं अपने आप से आनंदित होऊँगा, मैं अपने मन को शांत रखते हुए, अपने अंदर उस महान आनंद के रस-सागर में डुबकी लगाता रहूँगा| जब मैं प्यासा ही ना रहूँगा, जब मेरा मन तड़पेगा ही नहीं, तो मैं क्यों चाहूँगा कि दूसरे मुझे अच्छा कहें, मुझे महान कहें या मेरा अपमान न करें| सच तो ये है कि जब अपमान मिलता है ऐसे शांतशील व्यक्ति को, तो वो उस अपमान पर भी अंदर ही अंदर मुस्कुराता है औरये भी हो सकता है, कि उसकी वो मुस्कान उसके होंठों तक भी आ जाए| लेकिन हम पीड़ित हैं, संतापित हैं, तो कृपया इसका दोष, दंड दूसरो को मत दीजिए| इसका दोष और इसका दंड अगर देना ही है, तो स्वयं को दीजिए| जब आप अपने अंदर किसी के भी प्रति क्रोध को रखे,वो जायज़ हो या नाजायज़, प्रश्न इसका नहीं है, लेकिन क्रोध की अग्नि को अपने मन में जगाकर के रखते हैं, जलेंगे आप; क्रोध की अग्नि को जलाकर रखेंगे, लकलीफ़ होगी आपको| और अगर इस क्रोध की अग्नि को शांत कर देते हैं, तो सुकून में रहेंगे आप| अगर अपने मन से इस पीड़ा को निकाल देते हैं और बात को आई गई कर देते हैं, तब इसका सुकून, इसका सुख भी आपको ही मिलेगा| तो प्रश्न ये उठता है, क्या आप स्वयं को शांत रखना चाहते हैं? क्या आप अपने मन को सुकून में रखना चाहते हैं? तो इस बात की इंतज़ार मत कीजिए कि सामने वाला आकर के आपसे क्षमा माँगे और फिर आप क्षमा दें| मतलब दाता होने का जो ये शॉक पाल रहे हैं, ये छोड़ दीजिए| और अपने मन से द्वेष की भावना को, अपने मन से क्रोध की इस भावना को मुक्त कीजिए| क्या फ़र्क पड़ता है! शब्द ही तो हैं, इससे ज़्यादा कुछ नहीं| शब्द ही तो हैं, जब कोई किसी की तारीफ कर देता है| क्या दिया उसने? शब्द| शब्द किससे बने? वर्णमाला से| क ख ग से बने| अब इन मात्र कुछ अक्षरों के जोड़ से बने शब्द और शब्दों के जोड़ से बने वाक्य और वाक्यों के जोड़ से बने अनुच्छेद, जो किसी ने लंबा बोल दिया तुमको| अब वो शब्द कैसे थे , उन शब्दों के प्रभाव को आप कैसे लेंगे, ये आपके ऊपर निर्भर करता है| मैने एक बार एक पति पत्नी को आपस में हँसते-खेलते, बातचीत करते हुए देखा तो, पातिदेव अपनी पत्नी को, थोड़ी वो मोटी भी थी, और वो बार बार कहे- "ओ मोटी! अरे मोटी इधर आ| अरे मोटी चाय पिला| अरे मोटी चल घूमने चलते हैं|" अब वो बोल रहा है मोटी मोटी और वो खुश हो रही है और वो हँस रही है क्योकि उसे ये मालूम है कि ये जो शब्द आ रहे हैं, ये शब्द उसके प्रेम के संकेत हैं| लेकिन यही शब्द 'मोटी', उसको मान लीजिए कोई पड़ोसी कह दे, कोई अंजान व्यक्ति कह दे, कि इतना खा खा के क्यों फैल गई है, धरती पर बोझ बन गई है या कुछ भी इस तरह का कह दे| तब औरत को बर्दाश्त नहीं होगा| तब वो बहुत अपमानित महसूस करेगी| शब्द वही होते हैं| हम उनको कैसे लेते हैं, ये सब हमारे ऊपर है| हम उन शब्दों का अर्थ क्या लगाते हैं, हम उन शब्दों की क्या व्याख्या करतें हैं| तो अपने आप में, शब्द आपको कष्ट नहीं पहुँचा सकते| शब्दों मे ये ताक़त कहाँ कि वो आपको घायल कर सके| घायल हम तब होते हैं जब हम उन शब्दों को वो अर्थ देते हैं, जिस अर्थ से हमको पीड़ा हो, जिस अर्थ से हमको कष्ट हो|
मैं उदाहरण देती हूँ| बाबा बुल्लेशाह के जीवन का एक किस्सा कहती हूँ| एक बार बाबा बुल्लेशाह जी अपने गाँव की गलियों में घूम रहे थे| अपने साहिब, अपने मुर्शद के द्वार पर जाने के लिए उत्सुक, बड़ी खुशी और उमंग के साथ, वो भावना के साथ वो चल रहे थे, कि पीछे से किसी ने आवाज़ दी, "ऐ कुत्ते! कहाँ लूर लूर घूम रहा है?" अब ये पंजाबी का शब्द है- लूर लूर का मतलब बेमकसद घूमना| तो उन्होने पलट के पीछे देखा| मैं आपसे प्रश्न करती हूँ, बुल्लेशाह जी की क्या प्रतिक्रिया रही होगी? आप उनकी जगह होते और आपको कोई ये कहता, तो आपकी प्रतिक्रिया क्या होती? बुल्लेशाह जी की प्रतिक्रिया सुनिए| बुल्लेशाह जी पलटे और उस व्यक्ति के पास गए और उसके दोनो हाथ पकड़ के चूमते हैं और कहते हैं,"तेरी ज़ुबान मुबारक हो! तेरी ज़ुबान मुबारक हो! अल्लाह तेरी इस दी गई दुआ को पूरा करे|" वो आदमी बड़े चक्कर में पड़ गया| आस पास खड़े लोग बड़े हैरान होने लगे, कि यह क्या बात बोल रहा है| कौन सी दुआ दी, एटो गाली दे रहा है उसको| बुल्लेशाह निकल पड़े, पर एक सज्जन से रहा नहीं गया| वो पीछे पीछे आ गए और उसने रास्ता रोक कर पूछा, "अरे बुल्लेशाह, उसने तुझे ग़ाली दी, तुझे कुत्ता बोला, बेमकसद घूमने वाला बोला, और तू उसको जाकर मुबारक दे रहा है, उसके हाथ चूम रहा है, अल्लाह तेरी दुआ को पूरा करे, ये कुछ समझ नहीं लगी| बड़ी बेबूझ सी बात है, कुछ समझ नहीं आई| सो कुछ थोड़ी रोशनी डालो इसके ऊपर|" बुल्लेशाह ने कहा,"प्यारे! कुत्ता कैसा होता है? देखा कभी? अपने मालिक के दरवाज़े पर बैठता है, मालिक के साथ हमेशा वफ़ादार रहता है|मालिक रोटी दे तो भी उसके पाँव चाटता है, मालिक डंडा मारे तो भी उसके पाँव चाटता है, और चाहे कुछ हो जाए, वो अपने मालिक का घर कभी नहीं छोड़ता है, चाहे उसे सौ सौ बार जूते खाने पड़े| लेकिन फिर भी वो जूता खा के भी, अपने मालिक की वफ़ादारी निभाता है| उस व्यक्ति ने मुझे कुत्ता कहा, तो कितनी खूब बात बोल दी| मेरे अंदर मेरे अल्लाह ताला के लिए, मेरे मुर्शद के लिए ऐसी वफ़ादारी आ जाए कि मुझे मार पिटे, मेरे गुरु से या परमात्मा की ओर से मुझे मार पिटे, और तो भी मैं उसके गुण गाऊँ| मेरा साहिब, मेरा मुर्शद मुझसे नाराज़ हो और मुझपे डंडे बरसाए और तो भी मैं उसकी कदमबोसी करूँ| मैं कुत्ते जैसा वफ़ादार हो जाऊं| कुत्ते के पास जो खास चीज़ है, हम इंसानों के पास वो चीज़ नहीं है| और उसने मुझे कुत्ते होने की दुआ दी है, तो इतनी बड़ी दुआ,अगर मेरे जीवन में घटित हो जाए, तो इससे बढ़िया और क्या हो सकता है! तुलसीदास जी का ही एक बड़ा मिलता जुलता ही ऐसा ही एक दोहा है- 'तुलसी कुत्ता राम का, मुतिया मेरो नाओ| गले हमारे ज़ेवरी, जै खिंचे तह जाओ|' कि मैं तो मेरे राम का कुत्ता हूँ, उसके प्रेम की रस्सी मेरे गले में बँधी है और मेरा साहिब जहाँ मुझे ले जाए, मैं तो वहीं चला जाऊँ| मेरा राम जहाँ मुझे ले जाए, मैं तो वहीं चला जाऊँ| अब तुलसी अपनी खुशी से स्वयं को कुत्ता कह रहे हैं| कबीर साहिब का भी एक ऐसा ही दोहा आता है| 'कबीर कुत्ता राम का, मुतिया मेरो नाओ|' वो भी यही बात कह रहे हैं कि मैं तो मेरे साहिब का, मेरे परमात्मा का, मेरे अल्लाह ताला का, मेरे प्यारे का मैं कुत्ता हूँ और उसी के नाम का ये टोकन मेरे गले में पड़ा है और मैं तो बड़ा सुरक्षित हूँ| क्योंकि जिसके गले में, ये सरकारी टोकन रहता है वो कुत्ता आवारा ऩही है और फिर उसको सरकारी कर्मचारी गोली नहीं मारते हैं| या हम ये भी कह सकते हैं जिसके गले में ऐसा टोकन रहता है, वो सुरक्षित रहता है| तो कबीर साहिब हों, तुलसी साहिब हों, या बुल्लेशाह साहिब हों, सबने अपने आपको इस प्रकार से प्रदर्शित किया है कि उनको कठोर शब्द किसीने कहे, तो भी वो उन शब्दों से घायल नहीं हुए| तो कुछ थोड़ी सी हम शिक्षा ले सकें और हम स्वयं को आनंदित और पीड़ामुक्त रखना चाहें, तो हम ऐसी इच्छा अपेक्षा क्यों करें, कि कोई हमारे पास आए और माफी माँगे, तो उसे माफी देके इस पीड़ा से मुक्त हों| नहीं! आसान तरीका है| बस इस क्रोध को पिघल जाने दीजिए और उस व्यक्ति के लिए सहानुभूति महसूस करें, और अगर आप ये क्षमा स्वयं को दे देंगे, उस घाव को छेड़ेंगे नहीं, तो आप आनंदित रहेंगे| इसलिए अपने आपको इस पीड़ा से मुक्त करो और अपने आपको क्षमा करो; अपने आपको क्षमा का दान दे दो और आनंद से रहो|
-गुरुमाँजी
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Tags: depression, ego, emotions, frustration, happiness
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