जब मैं ध्यान में प्रवेश करती हूँ, तब देह का आभास नहीं रहता…
Q : जब मैं ध्यान में प्रवेश करती हूँ, तब देह का आभास नहीं रहता.उसके बाद साँस भी सामान्य गति में हो जाती है| कुछ समय पश्चात शांति का आभास या आनंद होता है| यह सब कुछ जो हो रहा है, उसको कौन जान रहा है? मन, बुद्धि या साक्षी, यह जाँच कैसे हो, जनाने में कृपा करें| साधक
Answer देह का आभास मैं साक्षी ही, मेरे मन के द्वारा करता हूँ|मैं ही मन के द्वारा देह का आभास पाता हूँ और जब भीतर चैतन्यता उरूज़ पे होती है, जब भीतर चैतन्यता जाग्रत हो जाती है तो इसी चैतन्यता में ऐसे क्षण आ सकते हैं, जहाँ आप कह सकते हैं कि एक तरह की बेहोशी, बाहर का पता ना लगना, हम कह सकते हैं बेहोशी| लेकिन एक बेहोशी, बेहोशी जैसी है और एक बेहोशी होश से भी पैदा होती है| इसको हम कह सकते हैं निर्विकल्पता| देह है, देह का होना,पता लगना भी एक विकल्प है, एक विचार है| देह है, देह का पता होना भी मन के विचार से मालूम होता है| पर जब मन और मन के विचार न रहें, तो जिस मन के विचार के कारण देह के होने का एहसास हो रहा था, अब वो यंत्र ही नहीं है तो देह का एहसास कहाँ से होगा? कौन जानता है इस स्थिति को? मन तो निश्चित नहीं, क्योंकि मन तो मौजूद नहीं हैं, उतने क्षण को मन नहीं हैं, मन का अभाव है|
मन और बुद्धि दोनों आपस में जुड़ें हैं, संकल्पात्मक मन हो गया और निश्चयात्मक बुद्धि| संकल्प और निश्चय, बस इतना ही भेद है मन और बुद्धि का| संकल्पात्मक तो मन है, निश्चय हो गया तो बुद्धि, मुझे देह का ज्ञान नहीं हो रहा, तब नहीं हो रहा था. मन ने एक संकल्प उठाया और बुद्धि ने कहा, नहीं, निश्चय ही पता नहीं चला उस समय पर| बस इतना ही फ़र्क मन और बुद्धि का| मैं मेरे साक्षी स्वरूप में जब भी स्थित होऊँगा, मैं मेरे साक्षी स्वभाव में जब भी स्थित होऊँगा, तब गहरी अवस्था जहाँ छुई , वहीं पर ऐसे क्षण आते हैं जहाँ देह का और आस-पास जो कुछ भी है उसका, कह सकते हैं लोप हो जाना| शरीर तो है पर जैसे गहरी निद्रा में जब बुद्धि नहीं रहती है, जब मन नहीं रहता है, तो तब भी शरीर का एहसास कहाँ होता है? तो बंदा मर थोड़ी गया? शरीर तो चल रहा है, शरीर को तो चित्त चला रहा है, प्राण चला रहें हैं|
तो शरीर का आभास हमें गहरी निद्रा में नहीं रहता है| पर निद्रा में एक बेहोशी है, इसी तरह ध्यान में जब जहाँ आपकी गहरी स्थिति मन की हुई, जहाँ निर्विकल्पता आई, तहाँ देह के होने का पता भी नहीं रहेगा| पर यहाँ फ़र्क यह है यहाँ आप बेहोश नहीं है, यहाँ आप हैं पूरी होश में| लेकिन जो होश मन के द्वारा बाहर शरीर की ओर जा रही थी, अब बाहर न जा कर वो चैतन्यता चूँकि मेरे ऊपर ही आ रही है, तो देह का, इन्द्रिय का, मन का, शरीर जहाँ बैठा है उसका, किसी का भी एहसास नहीं रहता| पर ये निर्विकल्पता बहुत लंबे समय को चूँकि नहीं रहती है, तो जल्दी ही जब फिर से होश जगी, अब होश जगी, तो फिर मन, बुद्धि भी जगे और जब मन, बुद्धि जगे तो मन-बुद्धि कह रहे तब ऐसा हुआ था| अब मन अनुमान लगा रहा है, अब मन अनुमान लगा रहा है कि अभी तो पता चल रहा है, तब पता नहीं चला| लेकिन जिस समय यह घटना घट रही होती है, उस समय पर ना मन है ना बुद्धि, दोनों ही नहीं, दोनों का ही अभाव हो गया|
लेकिन होश आने पर मन फिर जब विचार करने लगा, बुद्धि फिर विचार करने लगी, बुद्धि फिर उसकी स्मृति को लाने की कोशिश कर रही है कि ऐसा तब हो रहा था| ऐसा तब.. हो रहा था| जानने वाला कोई और नहीं है, जानने वाला वह साक्षी ही है| साक्षी दूसरे को तो जानता है और स्वयं को भी जानता है, इसलिए साक्षी है| पर साक्षी को यह मन, बुद्धि नहीं जानते| मेरी चैतन्यता का बोध मुझ को है, मैं मेरी चैतन्यता से मेरी मन, बुद्धि का भी ज्ञान करता हूँ| पर इस मन, बुद्धि में इतनी उड़ान नहीं कि यह मुझे पकड़ सकें, इसलिए जब मैं, मेरी होश में जग जाता हूँ तो मन, बुद्धि दौड़ जाते हैं तब| बाद में अनुमान लगाते हैं, इसलिए यह कहा कि समाधि की अवस्था का वास्तविक और सही-सही शब्दों में ज्ञान कोई नहीं करा सकता, कोई परिभाषित नहीं कर सकता है| क्यों? क्योंकि जब समाधि घटित हुई वहाँ न मन था, ना बुद्धि| तो अब मन और बुद्धि उस स्थिति का बोध या उसके बारे में विश्लेषण कैसे करेंगे?
जितने शास्त्र हैं, यह उन ऋषियों ने अपने अनुभव को अपनी स्मृतियों से कहा है| क्योंकि जिस समय अनुभव हो रह था, ना मन था ना बुद्धि थी| मन और बुद्धि की तो मौत है, मन और बुद्धि तो उस समय मौजूद थे ही नहीं| इसलिए एक तरह से कह सकते हैं कि सारे ही शास्त्र झूठ हैं क्योंकि सत्य कैसे कह सकते हैं, जैसे जलेबी खाई तो जीभ ने, स्वाद जीभ ने लिया, आँख ने देखा, जलेबी सुंदर है और जीभ बखान कर रही है कि जलेबी सुंदर है| अब चूँकि इस जिह्वा में दो इंद्रियाँ हैं, एक बोलने की शक्ति और एक रस और स्वाद लेने की शक्ति| तो चूँकि स्वाद भी ले रहे इस जीभ से और बोल भी रहे हैं इस जीभ से| आप को क्या लगता है खाई हुई जलेबी का वर्णन आप अपनी जीभ से सौ प्रतिशत बिल्कुल सही कर सकते हैं?
आपसे कोई पूछे जलेबी मीठी है, कैसी मीठी है? क्या कहोगे, चीनी जैसी मीठी है, गुड़ जैसी मीठी, शहद जैसी मीठी, मिठाई जैसी मीठी, कैसी मीठी? फूल देखा आँख ने, जीभ ने कहा, फूल बड़ा सुंदर है| जो जीभ कह रही है कि फूल बड़ा सुंदर है, उस जीभ ने फूल को देखा नहीं, देखा जिस आँख ने उस आँख के पास जीभ नहीं| कान ने शब्द सुना, आ…हा…हा! बहुत बढ़िया! राग सुना, बहुत अच्छे| क्या भैरवी गाई है, कान ने सुना और जीभ ने वाह-वाह की, जीभ ने सुना नहीं, कान बोल नहीं सकते| इसलिए जब कोई बहुत अच्छा संगीत सुने न तो शब्द वो ही होते हैं आहा… आहा… ! वहीं कोई खराब गाने वाला हो तो कहेंगे, आहा! हैं वो ही दो शब्द, प्रसन्नता में भी कहे जा सकते हैं, प्रसन्नता में टोन दूसरी होगी|
एक ने कहा कि भाई साहब,! आपके घर में हारमोनियम है, आप सुबह बजा रहे होते हैं? हाँ बोले, हमारे घर में कुछ मेहमान आ रहे हैं, हमें आपका हारमोनियम चाहिए| अच्छा! क्या आपके मेहमान भी गाते हैं? बोले, नहीं वो तीन-चार दिन रहेंगे न, तो हारमोनियम यहाँ रहेगा तो तुम नहीं गाओगे| हम तो परेशान हो ही रहे हैं, हमारे मेहमान क्यों परेशान हों? तो चार दिन के लिए आपका हारमोनियम उधार चाहिए| हारमोनियम तो वो ही है, लेकिन उस हारमोनियम से आप स्वर कैसे निकालेंगे, यह तो निकालने वाले पर निर्भर करता है| एक कोई गायक गाना गा रहा है, गायक को आप सुन के कहते हो वाह-वाह और सुनाओ और सुनाओ, और एक ने गाना शुरू किया तो लोग कहते हैं बस कर…. बस कर अब| कान वही हैं| कान ने जो सुना और जीभ ने उसकी स्तुति गायी और अजीब बात यह है जीभ ने सुना नहीं और कान के पास जीभ नहीं|
इसी तरह से समाधि के गहन अनुभव में मन, बुद्धि हैं नहीं और इसी मन, बुद्धि से तुम समाधि में क्या हुआ यह वर्णन करने लग जाओ वो कैसे सच्चा हो सकता है| इसी नाते मैं कह रही हूँ सभी शास्त्र झूठ हैं, कोई शास्त्र सच नहीं है.| गुरु का कहा हर शब्द भी झूठ है| पर मज़े की बात तो यह है कि जिस शिष्य को गुरु के झूठ की समझ लग जाए, उसका कल्याण हो जाता है| क्योंकि उसको गुरु यह शब्द झूठ कह रहा है वह जानने के लिए शिष्य को खुद अनुभव करना होगा और जिस दिन खुद अनुभव कर लेगा तो जानेगा गुरु के कहे शब्द संकेत थे, इशारे थे, वो भी पूरे नहीं थे| सच तो यह है जिस दिन गुरु के कहे गये झूठ को शिष्य पकड़ लेता है उस दिन गुरु धन्य हो जाता है क्योंकि शिष्य धन्य हो गया| मैंने गाया था न, "मुझे मेरी मस्ती कहाँ ले के आई, जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नहीं है, है मस्ती ही मस्ती, यह मस्ती है छाई, यह मस्ती है कैसी ,पिया कुछ नहीं है| मुझे मेरी मस्ती कहाँ ले के आई, जहाँ मेरे अपने सिवा कुछ नहीं है"|
तो ऐसी स्थिति के बारे में मन-बुद्धि वर्णन करना चाहें तो क्या करेंगे? सत्य नहीं हो सकता है| तो चैतन्यता के सघन होने पर भी एक तरह की कह सकते हैं बेहोशी, उसको हम बेहोशी नहीं कहते, उसको हम खुमारी कहते हैं| बेहोशी-बेहोशी, अंतर करना मुश्किल हो जाएगा, तो कबीर ने शब्द दिया खुमारी| खुमारी क्या है? न होश, न बेहोशी, वो होश जो बेहोशी जैसी है या ये कह सकते हैं वो बेहोशी जो होश जैसी है| तो कहा खुमारी, गुरु नानक ने भी कहा, "नाम खुमारी नानका चढ़ि रहे दिन रात"| खुमारी-खुमारी, न होश, न बेहोशी, तो जब भी खुमारी छाएगी, तब यह ही होगा कि बचे सिर्फ़ तुम, बची सिर्फ़ तुम्हारी चैतन्यता, ना मन बचा, ना बुद्धि तो जब मन-बुद्धि दोनों बचे ही नहीं तो कोई क्या कहे, कोई क्या सुने या कोई क्या बोले| इसलिए कहा "कहन-सुनन ते बाहर स्वामी". वो स्वामी को हम बोलने में ला नहीं सकते, वो शब्दों के घेरे में आएगा नहीं|