मैं अपनी पुत्री के लिए चिंतित हूँ, क्या करूं? और क्या मैं विद्यार्थियों को साधना के पथ पर चलाने का प्रयास जारी रखूँ या समय से पूर्व सेवा निवृत्ति ले लूँ?
Q : मैं आई.आई.टी. में प्रधानाचार्या हूँ| जब मैं अपनी पुत्री के साथ रहती हूँ तो दोनों मिल के घर में एक अच्छा वातावरण बना लेते हैं, लेकिन जब मेरी पुत्री घर में नहीं रहती है तब सिर्फ़ ऑफिस का कार्य, काम करना और उसी में लगे रहना और उसी में दिमाग़ रह जाता है| मैने अपने संस्थान में अपने विद्यार्थियों को "सिमरन" सी.डी. से परिचित कराया है| उसके द्वारा विद्यार्थियों को बैठना सिखाया है और वो सब विद्यार्थी मेरे साथ बैठते हैं और उसका आनंद ले रहे हैं| पर क्या मैं समय से पूर्व सेवा निवृत्ति प्राप्त कर लूँ या कि अभी मैं अपने इस काम को चलाती रहूँ?
संजोगिता रानी
Answer देखिए, पहली बात तो ये है मैं किसी को ये कहती ही नहीं कि तुम ये करो और ये ना करो| ये मेरा विभाग नहीं है, ये मेरा काम नहीं है| हम ये कह सकते हैं कि अगर आप जल्दी सेवा निवृत्ति प्राप्त करना चाहते हैं तो अपनी खुशी से होइए और आप के सामने कुछ ऐसा करने को हो, कुछ सृजनात्मक, कुछ सीखने की क्रिया जिसमे चलती रहे, तो फिर तो ले लीजिए चार ही साल बचे हैं और मैं ये भी कहती हूँ की अगर ये चार साल जिन विद्यार्थियों को आपने ध्यान की ओर उत्सुक किया है और आपने उनको ये नया रास्ता सिखाया है, आए तो वो हैं तकनीकी शिक्षा प्राप्त करने पर साथ-साथ में उनका ये जो अध्यात्म से परिचय हो रहा है, खुद प्रधानाचार्या कराएगी तो ये बहुत अच्छा रहेगा|
सच बात तो ये है आजकल हम ये कोशिश कर रहे हैं, कल भी हम एक संस्थान में जा रहे हैं, 'नेताजी सुभाषचंद्र इन्स्टिट्यूट' , सरकारी संस्थान है, जो तकनीकी शिक्षा के लिए बहुत प्रसिद्ध है, वहाँ के विद्यार्थियों को हमारे यहाँ के जो प्रशिक्षित साधक हैं वो जा के योग निद्रा करा के आए थे और उन बच्चों को, विद्यार्थियों को बहुत अच्छा लगा| अब उन्होंने फरमाइश करी है कि हम गुरुमाँ को मिलना चाहते हैं, तो कल मैं उन्ही को मिलने उनके संस्थान में जा रही हूँ| सच कहूँ तो मुझे बड़ी खुशी होती है, कारण इस उम्र में अभी दिमाग़ ताज़ा है, ज़्यादा कुछ गड़बड़ी नहीं अभी हुई होती क्योंकि अभी उतनी आसक्तियाँ विकसित नहीं हुई होती| सपने बहुत होते हैं, बहुत सारे सपने होते हैं, ये कर लूँ, वो कर लूँ, मशहूर हो जाऊँ, पैसे वाला हो जाऊँ, जैसे होता है सब का, जवानी के ये जोश होते हैं बहुत से| लेकिन अभी आसक्तियाँ नहीं होती, अभी भावनात्मक और रिश्तों की जो जटिलता होती है, अभी वो नहीं आई होती और ये भी है कि अभी बुद्धि बहुत अच्छी होती है, अक्ल बड़ी अच्छी होती है| और ऐसे समय में अगर किसी को किन्ही अच्छी चीज़ों से परिचय हो जाए तो वो पूरी जिंदगी के लिए उनको ऐसा हम उपहार दे देते हैं जिससे वो कभी कम से कम प्रेमिका रूठ गई इसलिए आत्महत्या नहीं करेगा और अच्छी नौकरी नहीं मिली इसलिए वो आत्मघाती नहीं हो जाएगा या घर में माँ-बाप से या भाई-बहन से या किसी सहकर्मी से थोड़ी अनबन हो गई है तो सिर्फ़ इसी बात के लिए तनाव में आ करके अवसाद (डिप्रेशन) में नहीं चला जाएगा| कम से कम हम ने उसको बहुत से मनोरोगो से बचा लिया| तो ये चार साल आप विद्यार्थियों को ये सब चीज़ें सीखने के लिए भी इस्तेमाल कर सकती हैं, ये भी बड़ी अच्छी बात होगी| तो देखिए हमारे लिए तो दोनों ही बातें अच्छी हैं| आप स्वेछा से सेवा निवृत्त होती हैं तो भी अच्छा है, आप सेवा निवृत्त नहीं होते तो भी अच्छा है| वो करें जो आप को उचित लगे लेकिन जीवन में जो भी करें उस कम को बहुत आनन्द से करें अब उसका नतीजा क्या होगा इसकी परवाह किए बगैर करिये और करने में सुख हो रहा हो, करने में आनंद हो रहा हो और जब हम अपने जीवन को साधनाओं से भरते हैं और उन साधनाओं से धीरे-धीरे दूसरों को भी परिचित कराते हैं, भाई अच्छी चीज़ है तू भी सीख ले, तू भी कर ले| तो वो तो ऐसी भेंट है जो बहुत उन्नत लोग ही दूसरों को दे सकते हैं| तो आपने एक चीज़ का लाभ लिया है उस चीज़ को अगर आप दूसरे विद्यार्थियों को दे पाती हैं तो ये बहुत बड़ा काम है, बहुत अच्छा काम है|
बाकी रही बात तुम्हारी बेटी की तो जो उसका भाग्य होगा उसको वो ही मिलेगा| कोई माँ, कोई बाप किसी बच्चे के भाग्य को नहीं बनाते हैं| उनके द्वारा बच्चे सिर्फ़ जन्म पाते हैं और फिर बच्चे अपनी यात्रा को करते हैं| लेकिन माँ-बाप उसकी किस्मत नहीं बना सकते और किस्मत कोई किसी की नहीं बना सकता है, हर जीव अपने कर्म-संस्कारों के अनुसार बहता है, चलता है और आप सिर्फ़ अच्छी भावना रख सकते हैं, आप सिर्फ़ इच्छा कर सकते हैं कि वो अपने लिए जीवन में कुछ अच्छा कर पाए, लेकिन वो कर पाएँगे की नहीं कर पाएँगे| हमारे पास एक बेटी आई थी माँ उसकी विधवा है, उसने पैसे इकट्ठा कर के जैसे-तैसे अपनी बेटी की शादी करी| तीन महीने में ही लड़की का तलाक़ को गया और घर वापिस आ गई| अब क्या करें? क्या कर सकते हैं? कभी-कभी जीवन में इस तरह के मोड़ आते हैं जहाँ आप व्यक्तिगत रूप से बहुत असहाय हो जाते हैं| आप कुछ भी नहीं कर सकते और मेरे देखने में जीवन सीखने का नाम है, जीवन अनुभवों का नाम है और अनुभव बुरे या अच्छे ऐसा उनका वर्गीकरण नहीं करना चाहिए| कभी-कभी जो बुरा दिखता है वो बुरा होता नहीं है| कभी-कभी जो अच्छा दिखता है, वो अच्छा होता नहीं है|
मैं एक उदाहरण देती हूँ, कुछ दिन पहले एक सज्जन ने मुझे बताया, वो जिस कार में सफ़र कर रहे थे उस कार को परिवहन कर्मचारी (ट्रॅफिक कॉन्स्टेबल) ने रोका कि रुकिये, पिछला संकुलित यातायात(कॉंजेसटेड ट्रॅफिक) जो है उसको वो निकाल रहे थे जोकि सामने से आ रहा था, उन्होंने मुझे रोक दिया, मुझे थोड़ा गुस्सा आ रहा था कि मुझे क्यों रोका इसने, मुझे जल्दी पहुँचना था| कहते हुआ यूँ कि जो मेरे सामने ट्रॉली थी जिसमें सात-आठ टन गन्ने भरे हुए थे| फिर ट्रेफिक पुलिस ने कहा, अच्छा चलिए| बोले ट्रॉली निकली, हमारी गति बहुत कम थी, शायद अभी दो किलोमीटर माने अभी दो तक ही सुई गई होगी, दस तक भी नहीं पहुँची होगी, ट्रॉली सामने चल रही है| कहते मेरी नज़र पड़ी कि ट्रॉली का पिछला टायर निकला और इधर ट्रॉली पलटने लगी, और इधर मैंने अपने ड्राइवर को ज़ोर से दबका मारा,"रोक" और उसने एकदम ब्रेक लगा दी| मेरे सामने सारी ट्रॉली पलट गई, कह रहे दो मिनट के लिए तो साँस नहीं आई हम लोगो को कि अगर हम कहीं स्पीड से आ रहे होते तो ट्रॉली हमारी गाड़ी के ऊपर ही पलट जाती और आठ टन गन्ने में दब के मर जाते| कहते हम सोच रहे थे कि ये बेवकूफ़ हवलदार ने हमें क्यों रोका, हमें क्यों नहीं जाने दिया, लेकिन अगर हम उतनी ही तेज गति से आ रहे होते तो हम ठीक ट्रॉली के बराबर होते जब ट्रॉली पलट रही थी| उसने रोका ये बुरी बात थी कि अच्छी बात थी| जिसको आप बुरा कह रहे हो ज़रूरी नहीं कि वो बुरा है| जिसको आप अच्छा कह रहे हो, ये ज़रूरी नहीं है कि वो अच्छा है| एक के घर में पुत्र होता है, बड़े खुश हैं, बेटा आया, बेटा आया चौदह साल की उम्र में बाप का गला काट दिया| पुत्र होना अच्छा हुआ कि बुरा? क्या कहोगे? एक महिला बता रही थी कि उसने लॉटरी में पच्चीस लाख रुपये जीते| बोली जिस दिन से पच्चीस लाख जीतने की खबर फैली है हमारी जान आफ़त में आ गई है| रोज फ़ोन आते हैं गुंडों के, दस मुझे दे, पाँच मुझे दे, पंद्रह मुझे दे नहीं तो तेरा बेटा उठा लेंगे, नहीं तो तुझे मार देंगे| बोली, हम तो घर से बाहर नहीं जा सकते| बोलिए ये लॉटरी निकलना अच्छा हुआ की बुरा? अब देख लीजिए लॉटरी निकली तो वो अच्छा ही मान रहे हैं, खुश हो रहें हैं| लेकिन उसके साथ जो गतिविधियाँ होने लग गई तो कष्ट होता है कि ये क्यों हो रहा है| जिंदगी एक पहेली है| जैसा जो दिखता है वैसा वो है नहीं, जो दुख की चीज़ है वो असल में वो सुख की होती है| जो सुख की चीज़ होती है, उसके पीछे दुख होता है|
एक सज्जन और बता रहे थे, बोले मैंने फ्लाइट लेनी थी और मैं हवाई अड्डे पर था और मुझे ये मालूम हुआ कि मेरी जो सीट है वो किसी और को दे दी गई है, ये थोड़ा घपला करा वहाँ के कर्मचारियों ने और मुझे कहा गया कि आपको अगली फ्लाइट में भेजेंगे क्योंकि आप देर से आएँ हैं| अब क्या कर सकते हैं? बोले ठीक है, बोले मैं बैठ गया हवाई अड्डे पर और दो घंटे बाद अगली उड़ान थी| बोले, अगली उड़ान से पहले हम लोग टीवी में समाचार देख रहे थे| जो जहाज़ उड़ा था वो बीच हवा में ही विस्फोटित हो गया| तो उसकी सीट जाना अच्छा था कि बुरा था? इसलिए बहुत जल्दी नहीं करनी चाहिए किसी भी चीज़ को ग़लत या किसी भी चीज़ को अच्छा बहुत जल्दी नहीं कह देना चाहिए| मानव मन, मानव बुद्धि में अभी उतनी क्षमता नहीं है कि वो अच्छे और बुरे के फर्क को समझ पाए| घटनाएँ जो घटे तुम्हारे जीवन में, उनको स्वीकार कीजिए और तटस्थ हो कर के,निष्पक्षता से उसका अनुभव करें और फिर जो हो, वो होने दे क्योंकि जो चीज़ होनी है वो हो कर रहेगी, उसको कोई रोक नहीं सकता, तो फिर खामख़ाँ आप अपनी इच्छाओं का जाल मत बनाया करो कि ऐसा ही हो, ऐसा ना हो क्योंकि जो होना है वो होगा और जो नहीं होना है वो नहीं होगा| तो आप की जो पूरा ध्यान है वो सिर्फ़ अपने मानसिक, बौद्धिक और अध्यात्मिक विकास की ओर होनी चाहिए| उसमें ये सोच मत ले आइये कि जो होगा, वो होगा और जो नहीं होना है वो नहीं होगा| उसमें आपकी पूरी कर्तव्यनिष्ठा होनी चाहिए, पूरी ईमानदारी,परिश्रम और पूरी शक्ति व जोश के साथ साधना को करो और अपने जीवन में परिवर्तन को लाओ| ये आपके हाथ में है, इसको आप मत छोड़ दीजिए| अपने जीवन के सृजनकर्ता खुद बानिए| आपका मन आपका गुलाम हो जाए और आपके नियंत्रण में हो और आपका मन आपको कभी परेशान ना करे| ऐसी साधना करना, ऐसी तैयारी करना ये हर मानव का कर्तव्य है|
गुरुमाँजी
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