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योग निद्रा

आधुनिक मनुष्य की बहुत सारी मनोवैज्ञानिक आपदायें हैं। न्यूरासिस हैं, फोबिया हैं, मेनिया हैं, डर हैं। और इसके कारण आप एक स्वस्थ जीवन नहीं जी पाते। जैसे अंधेरे से कईयों को डर लगता है, मकड़ी से डर लगता है। किसी – किसी को लाल रंग से डर लगता है। किसी – किसी को तंग जगह में अन्दर जाने से डर लगता है। किसी को ऊंचाई से डर लगता है। वह ऊंचाई पर नहीं जा सकता है। अब ये सब डर , ये सब जो भय हैं , ये भय भी आपकी साधना में बहुत बड़ी रुकावट होते हैं और योगनिद्रा में आप इन्हीं सब न्यूरासिस , फोबिया और मेनिया से बाहर आ सकते हैं। योग निद्रा का जो बहुत गहरा लाभ होता है , वह यह है कि यह अपने आपमें एक पूर्ण ध्यानविधि है । योगनिद्रा सिर्फ़ शरीर और मन को विश्राम ही नहीं दे रहा, आपके शारीरिक और मानसिक रोगों को ही दूर नहीं कर रहा है, यह अपने आपमें ध्यान का एक अदभुत तरीका है। इसका आधार है तंत्र।

जो कर्मकाण्ड जानते हैं , यज्ञ को किसी ने ठीक से किया हो , तो यज्ञ में सबसे पहले विन्यास होता है मन्त्र उच्चारित करते हुए अँगुलियों से १२ अंगों को स्पर्श किया जाता है और उसके शुद्धिकरण के मन्त्र बोले जाते हैं । कंधे , घुटने , मुख , आँख , मस्तक इत्यादि को स्पर्श किया जाता है । जितने भी आर्यसमाजी यज्ञ करते हैं , वह ये बात जानते हैं । विन्यास के बगैर यज्ञ की शुरुआत नहीं होती । सबसे पहले जिस शरीर के साथ यज्ञ , मन्त्र करने लगे हैं , उस शरीर के प्रति भाव सुंदर किया जाता है पवित्रता लाई जाती है । सिर को, माथे को, कानों को, आंखों को, नाक को, मुख को, कन्धों को, सीने को, घुटनों को, पैरों को, हाथों को मन्त्र के साथ स्पर्श किया जाता है , और भाव किया जाता है कि ये सब शुद्ध हो रहें है ।

विन्यास के आधार पर योग निद्रा है और जैसा मैंने कहा कि इस विश्राम के बाद जब आप अपने भीतर एक गहराई को महसूस करते हैं , यह गहराई आपके मन के अलग – अलग तलों को छूने से आती है ।

चेतना तीन तलों पर रहती है – जाग्रत, स्वपन, सुषुप्ति। जाग्रत अवस्था में आपका चेतन मन काम करता है । स्वपनावस्था में आपका अवचेतन मन काम करता है , और गहरी नींद में आपका अचेतन मन काम करता है । नींद, स्वपन और जागने में हम छलांग मारते हैं । अभी आप जाग रहें हैं । सोये तो सीधे सपने में और सपने में ही फ़िर गहरी नींद आ गई । प्राय: तुम लोग सिर्फ़ सोते हो या जागते हो । सोने और जागने के बीच में एक स्टेज ऐसी आती है , जहाँ न आप पूरे जगे हैं , जहाँ न आप पूरे सोए होते हैं । अब यह बहुत सूक्ष्मावस्था है । इस सूक्ष्मावस्था को पकडें कैसे ?

तो योगनिद्रा आप को इसी मध्य की अवस्था में लेकर जाती है । दोनों पैरों के बीच में थोड़ा अन्तर रहता है और पाँव ढीले छोड़ देते हैं । हाथ की हथेलियाँ आकाश की ओर खुली हुई , आँखे बंद , चाहे तो सिर के नीचे पतला सा तकिया भी रख सकते हैं । एक दम आराम से सीधे लेट जाना । अब ये क्या बढ़िया ध्यान की विधि है ! न सीधे बैठना, न वज्रासन, न सिद्धयोनि आसन योगनिद्रा को लेटकर करना है । एक बार पूरे शरीर को हमने विश्राम की स्थिति में ले जाना है । अब पूरी तरह से शरीर में विश्राम घटित हो गया और मन में भी विश्राम घटित हो गया तब आप अपने अवचेतन मन में संकल्प का बीज डालते हो ।

जो भी सुंदर परिवर्तन
आप जीवन में चाहते हो
जैसे – ज्ञान, समाधि, स्वास्थ्य।
जीवन में
हम जो भी उपलब्धि
करना चाह रहे हैं ,
विशेषत: अध्यात्म से
संबंधित ; क्योंकि दुनियावी
चीजों के पीछे ही तो तुमने
स्वयं को इतने तनाव दे रखे हैं ।
तो योगनिद्रा में एक शुभ
संकल्प ही होना चाहिए।

योगनिद्रा में विश्राम की प्रथम अवस्था के बाद जब आपसे कहा जाए कि अब संकल्प का समय है तब आप उस समय संकल्प करेंगे -
‘मेरा अध्यात्मिक जीवन श्रेष्ठ हो ।’
‘मुझे गुरु की कृपा प्राप्त हो ।’
‘मुझे समाधि हो ।’
‘मेरा जीवन स्वस्थ और ऊर्जामय हो ।’

इस तरह के छोटे – छोटे वाक्य हों , लंबा प्रवचन नहीं होना चाहिए । और अपने तक ही सीमित रहना । मन को इधर – उधर नहीं भटकाना ।

योगनिद्रा की पहली स्टेज में आपकी पूरी चेतना को आपके पूरे शरीर में समेट दिया जाता है । उस समय आप पूरे विश्राम में होते हैं , उसमें आप अपने आप को बार – बार कहेंगे कि ‘ मैं सोऊंगा नहीं ‘ ‘ मैं निर्देशों को सुनता रहूँगा ।’

यह कहना बहुत जरुरी है । अगर आप ये भावना जाग्रत नहीं करेंगे तो इधर हमने योगनिद्रा शुरु करी , उधर ‘ योग ‘ गया उड़ और खाली रह जायेगी ‘ निद्रा ‘।