ग़लत क्या है?

एक दिन अचानक सिद्धार्थ आधी रात को उठा और घर छोड़ कर चल दिया। सालों कुछ पता भी न चला कि सिद्धार्थ गया कहाँ। पत्नी को नहीं पता कि कहाँ गया। फिर कोई दस-बारह वर्षों के बाद सिद्धार्थ, जो अब तक बुद्ध नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे, जब वापिस लौटे, तो पिता को तो यही लगा कि इसे अपनी ग़लती का अहसास हो गया है, इसलिये अब अपनी गृहस्थी संभालने के लिए वापिस घर लौट रहा है।

असल में सिद्धार्थ इस सोच के साथ घर वापिस गये थे कि जिस माँ-पिता से उनका जन्म हुआ, जिस पत्नी से उन्हे पुत्र प्राप्ति हुई थी, उनके प्रति इतनी ज़िम्मेदारी उनकी बनती है कि जिस सत्य को उन्होने खोजा है, उस सत्य को जानने का अधिकार उनको भी मिलना चाहिए। तो मनमुटाव तो अभी भी था । पिता यही समझते थे कि बेटा घर लौट रहा है, वापिस राज सिंहासन संभाल लेगा। लेकिन जब मिले तो पता चला कि वे वापिस गृहस्थी होने के लिए नहीं आए हैं। वे तो उनको विछोह और विरह की पीड़ा से मुक्त करने के लिए आए हैं।

बुद्ध ने घर छोड़ा था, तो क्या उनके मन में उसके लिए कोई ग्लानि थी? पत्नी को छोड़ा, तो क्या उनके मन में कोई पीड़ा उठी थी कि मैने कुछ ग़लत काम किया? अब, देखा जाए तो जिस स्त्री को जीवन भर साथ निभाने का वचन दिया था पूरे समाज के सामने, उसी को उन्होने छोड़ दिया। सामाजिक न्याय-क़ानून की दृष्टि से सोचे तो यह अनुचित बात थी और अमानवीय भी थी कि उस नवजात पुत्र को वे किसके सहारे छोड़ कर जा रहे थे? पिता के, पति के और पुत्र के कर्तव्य से विमुख हो रहे थे।

परंतु बुद्ध ने जिस लक्ष्य के लिए यह सब कार्य किया, उस लक्ष्य के सामने ये सभी बातें नगण्य हो जाती हैं, उनका कोई अर्थ नहीं रह जाता। इसलिए बुद्ध को कभी उस बात की ग्लानि नहीं हुई और ग्लानि से मुक्त थे। इसलिए वे बिना संकोच, बिना किसी खिन्नता या किसी पीड़ा का भाव लिए वापिस भी चले गये।

आपका निर्णय आपको ग़लत इसलिए लगा कि लोग कहते हैं, धर्म कहता है, गुरु कहता है, सभी कहते हैं, इसलिए वह ग़लत लगा। जब आप किसी के कहने पर ग़लत को ग़लत मानें, तो वह ग़लत ही होता है। जब आप गुरु, ग्रंथ, पुस्तकें, संत, महात्मा, परिवार, समाज, क़ानून के दिए हुए नियमों के अनुसार अपने कर्मों को आँकते हैं, तब लगने लगता है कि अमुक बात ग़लत है, अमुक बात सही है। फिर उसी के अनुसार जो ग़लत है ‘वह हम न करें और सही करें’, ऐसी चाह मन में जगती है।

परंतु मन की जो आधारभूत प्रवृतियाँ हैं, जो कुदरती प्रवृतियों के प्रवाह बहते हैं, उनकी पूर्ति करने में अगर मन को मज़ा मिल रहा है; लेकिन सभी के अनुसार वह ग़लत है, पर मन को मज़ा मिल रहा है, तो आप उन थोपे गये क़ानूनों और नियमों की अवहेलना कर के कभी ना कभी फिर से उसी मन की मौज के लिए निकल पड़ेंगे।

स्थिति यह रहती है कि मन कुछ चाहता है, मन को तरंग चाहिए, कुछ एक़्साइटमेंट चाहिए। मन को एंद्रिक तृप्ति चाहिए, फिर वह जीभ हो, आँख हो, कान हो, पर मन को एंद्रिक संतुष्टि चाहिए। वह जो एक लहर उठती है मन में मज़ा करने की, अच्छा खा कर, अच्छा देखकर, अच्छा बोलकर, मन का झुकाव उसकी ओर होना प्राकृतिक है। क्योंकि जब तक आप अपने मन के स्तर को ऊँचा नहीं करते हैं, तब तक मनुष्य में मनुष्यता कम और पशुता ही अधिक होती है।

पशुओं के कोई क़ानून-नियम नहीं होते हैं। पशुओं के कोई संत-महात्मा, तीर्थ, गुरु, ग्रंथ नहीं होते, कुछ नहीं होता उनके पास। उनके पास सिर्फ़ एक चीज़ है, नैसर्गिक प्रवृति। भूख लगे तो खा लो, काम जागे तो भोग लो। कुत्ता-कुतिया कहीं भी सड़क किनारे, नदी किनारे, गली-मोहल्ले में संभोगरत होंगे । उनको कभी ऐसा नहीं लगेगा कि कोई बच्चा, कोई बड़ा, कोई बूढ़ा निकल रहा है। जानवर को इससे कोई लेन-देन नहीं है। आदमी को तकलीफ़ होती है। उसको बुरा लगता है। लेकिन जानवर के पास ऐसे कोई नियम, ऐसे कोई क़ानून नहीं है।

याद रहे, जब तक आपने अपनी चेतना को श्रेष्ठ नहीं बनाया है, तब तक आप पशु ही होते है। समाज, धर्म, गुरु - यह सभी मिलकर ज़बरदस्ती नियमों में बाँधकर व्यक्ति को इंसान बनाने की कोशिश करते हैं। नियम बना दिए जाते हैं कि यह सही है, यह ग़लत है, यह सही है, यह ग़लत है। यह जो पाशविकता तुम्हारे अंदर है, वह हमेशा जीतती है और जो इंसानियत है वह हमेशा हार जाती है।

तो तुम्हारे अंदर एक द्वंद हमेशा चलता रहता है। इसीलिए कहीं न कहीं मनुष्य खुद को नियमों में बाँध लेता है। उदाहरणार्थ, कुछ ऐसे व्रत लेता है, जैसे - ‘आज दिन भर मैं कुछ खाऊंगा नहीं’ । पर पेट में भूख लग रही है, जीभ में पानी आ रहा है। तो मन कहता है, ‘ कौन देख रहा है। अभी! फ्रिज खोल, खा ले’। मन कहता है,’कौन देख रहा है! थोड़ा सा थाली से उठा ले, आधी रोटी खा ले’। लेकिन अंदर कहीं उसका दिमाग़ है, वह कहता है, ‘नहीं, तूने व्रत रखा है और व्रत का नियम यह कहता है कि तुम्हे खाना नहीं चाहिए’।

पर इतनी भर बात सोच लेने से अंदर खाने की जो इच्छा जगी है, वह ख़त्म हो जाएगी? नहीं । क्यों नहीं होगी? क्योंकि आपके अंदर जो पाशविक प्रवृत्तियाँ है, वे बहुत ज़ोर से काम करती हैं और इन पाशविक प्रवृतियों का आप बुद्धि से कोई इलाज नहीं कर सकते हैं।

इसीलिए फिर आदमी बेईमान और झूठा हो जाता है । छिप-छिप कर एंद्रिक संतुष्टि चाहता है, छिप कर । गुरु, महात्मा, संत, ग्रंथ - ये सभी उसको कहते हैं कि, ‘ भई, नहीं, यह ग़लत है, यह मत करो।’ लेकिन वह छिप कर करता रहता है।

इसीलिए धार्मिक इंसान से ज़्यादा पाखंडी और कोई नहीं होता। वह दिन भर साधु का वेश पहने रहता है, पर जहाँ उसको कोई देखने पहचानने वाला न हो, वहाँ वह उतना ही शैतान होता है, जितना एक आम इंसान; जिसका रब, दुनिया, ग्रंथों, संतों से वास्ता-पाला न पड़ा हो।

फिर जैसे-जैसे यही इंसान सत्संग करना शुरु करता है, जैसे-जैसे वह बुद्धि से जानने की कोशिश करता है, वैसे-वैसे उसके अंदर यह अहसास आने लग जाता है कि ‘यह मैं ग़लत कर रहा हूँ’। लेकिन अभी भी यह अहसास उसकी अपनी अकल से नहीं आया है। अभी भी यह अहसास जो बार-बार जुटा पाता है संतों के वचनों का, उससे उसके अहंकार को चोट लगती है। तो वह अपने आप को सिखाने की कोशिश करता है कि ‘यह मैं ग़लत कर रहा हूँ, मुझे ऐसा कर्म नहीं करना चाहिए। पाप है यह, अशुभ है । मुझे पुण्यकर्म में लगना है, मुझे पाप कर्म में नहीं लगना है’।

लेकिन, फिर कह दूँ, आपकी अकल से ज़्यादा आपके विकार, आपकी भावनाएँ आप पर हावी हो जाती है। पेट में भूख लगी हो, तो उस समय आपकी बुद्धि को कितना भी ज्ञान दे दें कि सब्र करो, रोटी के बारे में मत सोचो, रोटी को याद मत करो, तो क्या इतने से तुम्हारे पेट को संतुष्टि मिल जाएगी? पेट कहेगा, ‘ज्ञान रखो अपने पास, पहले रोटी दो’।

हमारे शरीर की, इंद्रियों की जो भूख है, उस प्राकृतिक भूख के साथ आप ज़बरदस्ती नहीं कर सकते। लेकिन जब आपकी अकल में यह बात आ जाए कि मुझे अपने इस शरीर की और जीवन की रक्षा करनी है, क्योंकि शरीर स्वस्थ रहेगा तो ही मैं अपने अंदर के इस जानवर को मार सकूँगा, साधना कर सकूँगा । अब, यह बात जिस दिन गहराई से आपके दिमाग़ में आ जाती है, उस दिन के बाद ही फिर आपको चाहे कोई गुरु, पीर, महात्मा न भी देखें, न टोकें, तो भी आप चाह कर भी ग़लत मार्ग पर नहीं जा पाओगे। क्यों? क्योंकि अब आपकी अकल, आपका दिमाग़ कह रहा है।

ख्याल करिए, हम अपने ही दिमाग़ का हमेशा अनुसरण करते हैं। सच बात तो यही है कि हम किसी का अनुसरण नहीं करते हैं, हम हमेशा ही अपने दिमाग़ का अनुसरण करते हैं । अभी भी, तुम यहाँ बैठे हो। अभी भी तुम मेरा अनुसरण नहीं कर रहे हो । तुम्हारे दिमाग़ ने कही कि गुरु माँ के पास चलें, तभी तुम आए हो। फिर अगर तुम्हारा दिमाग़ कहे कि क्यों जाना है गुरु माँ के पास? तो तुम यहाँ नहीं आते। अभी भी आप मेरे पास नहीं आए हो, अभी भी आप अपने दिमाग़ के खेल में खेले जा रहे हो।

गुरु वाणी कहती है - गुरु को समर्पण करो। संत कहते हैं कि गुरु को समर्पण करो। पर सत्य यह है कि जब तुम चुनाव करते हो कि ‘यह मेरा गुरु होगा’, तो यह तुम्हारी ही अकल होती है। तुमने ज़िंदगी में कितने ही महात्मा, संत देखे होंगे। आस्था, संस्कार टी वी पर गुरुओं की बाढ़ आ रखी है। इतने गुरुओं में तुमने एक गुरु को चुना । तुम्हारे दिमाग़ ने चुना कि यही ठीक है । फिर तुम उसके पास गये। फिर तुमने वहाँ जाकर कह दिया कि ‘जी हम आपके हुए। हम आपके चरणों में झुके’। ध्यान से सोच कर देखिए, क्या आप अपने गुरु के सामने झुक रहे हो कि आप अभी अपने दिमाग़ के सामने झुक रहे हो? आप अभी अपने दिमाग़ के सामने झुक रहे हो।

गुरु से जब तुम कोई बात सुनते हो, वह अगर आपकी अकल में बात आ गयी, तो तुम कहते हो, ‘हाँ, सह बात ठीक है।’; अब तुम क्यों उस बात को ठीक कह रहे हो? उसके दो कारण होते हैं। एक- जैसा आपको सिखाया गया है बचपन से ले के आज तक, उससे अगर वह बात मेल खाती हो, तो कहोगे - ‘यह बात ठीक है’।

तो लाया तो यहाँ तुमको तुम्हारा दिमाग़ ही है। बैठे हो अगर, तो तभी बैठ कर सुन रहे हो क्योंकि तुम्हारा दिमाग़ अभी कह रहा है कि यहाँ जो मिलेगा या यहाँ ये जो बात बोलेंगे वह सही बोलेंगे। तुम कहते हो कि’ हमें आपसे बड़ा प्रेम है। दर्शन करने आए हैं।’ ख्याल करना अभी भी तुम्हे हमसे प्रेम नहीं है । जो ख्याल तुम्हारे दिमाग़ ने हमारे बारे में बनाया है, उस ख्याल को तुम नमस्कार कर रहे हो। समझ रहे हो मैं क्या कह रही हूँ? आपने हमारे बारे में एक इमेज बना ली अपने दिमाग़ में, दो-चार बार टी. वी. में तुमने सुना, खुले पंडाल में आ के सत्संग सुना, तो दिमाग़ में आपके एक इमेज बन गयी कि गुरु माँ ऐसे हैं - ‘गाते अच्छा हैं, बड़े दिमागदार हैं, बड़े समझदार हैं, ब्रह्मज्ञानी हैं, यह है, वह है’ - जो भी तुम्हारे दिमाग़ ने सोचा हो। अब वही इमेज ले करके तुम्हारा दिमाग़ तुम्हें यहाँ ले आया।

मान लीजिए, आप हमारे बारे में जो सोचकर यहाँ आए हैं, हम उसके विपरीत निकले… हम यहाँ बैठते ही अगर तुमसे कहें कि अच्छा अगर ज्ञान चाहिए, तो हमें तुम्हें दस लाख रुपया देना पड़ेगा। या मैं तुमसे कहूँ कि तुम्हे हमसे कुछ चाहिए, तो तुम्हे अपना मकान हमारे नाम कर देना पड़ेगा। तुम कहोगे, ‘अरे, ये तो कैसे हैं! संतों का काम ऐसे थोड़े होता है! संत लोगों का काम तो माया- मोह छोड़ खाली आशीर्वाद देना होता है। यह तो हमसे हमारा माल छीनना चाह रहे हैं ।’ तो क्या तुम कह सकते हो कि तुमने मेरे प्रति पूर्ण समर्पण किया है? नहीं, नहीं किया है तुमने पूर्ण समर्पण। क्या तुम कह सकते हो कि तुम मुझे जानते हो? नहीं, तुम नहीं जानते कौन हूँ मैं। आप वही समझते हैं, जितना आपका दिमाग़ समझता हैं। अब सोच के देखिए, तो पता चलेगा कि आप अपने दिमाग़ को ही कितना समझते हैं। आप अपने दिमाग़ को भी ठीक से नहीं समझते हैं।

वैज्ञानिक कहते हैं कि एक साधारण आदमी अपने दिमाग़ का सिर्फ़ चार प्रतिशत ही इस्तेमाल कर रहा है। माने, छियानबे प्रतिशत आपके दिमाग़ में क्या है, यह तुम्हे पता भी नहीं है।

तो कौन सी बात ग़लत है, क्या सही है, यह आप जानते ही नहीं हैं। आप ग़लत बात तो ग़लत या सही बात को सही अपनी अकल से नहीं कह रहे हैं। आप ग़लत उसी को कहते हैं, जिसे समाज ने, धर्म ने, गुरुओं ने ग़लत कहा है। आपने उतनी ही बात पकड़ी, एक लेबल लगा दिया कि यह ग़लत और यह सही, यह ग़लत और यह सही।

लेकिन तुम्हारे लेबल लगा देने से सच्चाई तो बदल नहीं जाएगी। पेट को भूख लगेगी, तो रोटी खाने के चाह तो होगी ही। तुम्हारे व्रत रख लेने से तुम्हारी भूख तो ख़त्म नहीं हो जाएगी। भूख अपनी जगह रहेगी ही। इसलिए आपके जीवन में क्या ग़लत हुआ था, उसके बारे में सोचना भी ग़लत है। क्योंकि अगर वह ग़लत था और आपका दिमाग़ यह बात समझ गया है कि वह ग़लत था, तो फिर शर्मिंदगी या पश्चाताप की कोई जगह ही नहीं बचती है। आप जानते हैं कि वह ग़लत था, यह आप समझ गये हैं। अब आप उस बात को दोबारा नहीं दोहराने वाले हैं। क्योंकि आप अपनी अकल से समझ गये हैं ।

इसलिए नहीं कि दूसरों ने इस बात को ग़लत कहा और आपको उसे ग़लत मानने पर मजबूर कर दिया। इसलिए नहीं कि गुरु का डंडा आपके सिर पर है। इसलिए नहीं कि आपको समाज का डर है। इसलिए क्योंकि अब आप अपनी अकल से समझते हैं कि अगर मैं अमुक बात करूँ, तो उससे मेरा अपना वक्त खराब हो जाएगा।

सारे गुरु और संत कहते रहे हैं, ‘रोज़ सुबह चार बजे उठना चाहिए’। पर तुम्हारा मन अभी राज़ी नहीं है इस बात को वैसे तो तुम कहते हो कि हाँ, बहुत अच्छा है सुबह उठना। पर तुम्हारा दिमाग़ दस तर्क खड़े कर देता है कि भई, हम तो दुनियादार आदमी हैं, हमें तो नींद बड़ी आती है। जवानी में नहीं सोएंगे तो क्या बुढ़ापे में सोएंगे! सौ तर्क तुम्हारा दिमाग़ खड़े कर देगा। या फिर तुम्हारा मन ऐसी बीमारियाँ खड़ी कर लेता है जो हैं नहीं ।

क्या आप जानते हैं कि आपका मन ऐसी बीमारियाँ आपके शरीर में भी खड़ी कर सकता है, जिनका कोई अस्तित्व ही नहीं है? जैसे, पेट दुख रहा है या कमर दुख रही है या कमज़ोरी लग रही है। जो यह बोलता है, ‘कमज़ोरी लग रही है’, उसके पीछे कुत्ता छोड़ दो। भागेगा की नहीं भागेगा? बिल्कुल भागेगा।

इसलिए थोड़ा सा आप इसके ऊपर विचार करें। अगर वह बात, जो आपने कही, वह ग़लत थी, जो भी थी, अगर वह ग़लत थी, तो वह एक सबक आपको दे करके आपके जीवन से विदा हो चुकी।

अब, कहाँ रहा वह समय जिसमे वह ग़लती आपने की थी? गया, वह गया, लौट कर नहीं आने वाला। अभी उसके विचार आपके मन में इसीलिए आ रहे हैं कि तुम्हारी बुद्धि आज इस बात को स्वीकार नहीं कर रही है। आज भी आप दूसरों के दिए हुए नियमों के अनुसार ही सोच रहे हैं कि वह जो कुछ हुआ, वह ग़लत था। आपकी अपनी अकल इस बात को अभी तक नहीं समझ पाई है। क्या तुम्हारे दिमाग़ ने उस बात को ग़लत करके स्वीकार किया? एक मिनट के लिए गुरुओं को, ग्रंथों को, समाज की धारणाओं को, सभी को साइड में कर दो… फिर क्या ग़लत है? अभी अगर तुमको कहा जाए कि जो कुछ धर्मग्रंथों ने या गुरुओं ने कहा है, वह सब झूठ है, बकवास है। तुम जो चाहो सो करो, कोई पुण्य-पाप का संबंध नहीं। तो क्या वैसा ही जीवन जीओगे जैसा अभी जी रहे हो?

आज तुमको समाज के नियम, धर्म का डर, यह सब; जो तुम करना चाहते हो उसे करने से रोकते हैं । लेकिन इंसान फिर-फिर फिसल जाता है। फिर फिसलता है और फिसलने पर कुछ न कुछ ऐसी बात हो जाती है जिसके कारण तुम्हारे मन में अपराध भाव जागता है।

अब, कर भी गये और पश्चाताप भी कर रहे। यह डबल गेम तो मत खेलिए। अगर सच में समझ गये हो कि वह ग़लत था, तो वह तो कब का जा चुका। आज के अपने जीवन पर ध्यान दीजिए कि आज आप अपने जीवन को सुंदर कैसे कर सकते हैं। और अपनी बुद्धि और अपने विवेक से अपने जीवन को जिएं । इसलिए नहीं कि दूसरे कह रहे हैं।

इसलिए ग़लत और सही की व्याख्या जो है वह आपकी अपनी अकल से आनी चाहिए। लेकिन मुश्किल यही है कि अभी दिमाग़ तो है लेकिन दिमाग़ में अकल नहीं है।

क्यों, क्यों कहना पड़े तुम्हे कि साधना के लिए समय दो? क्यों कहना पड़े कि आसन सही करो? क्यों कहना पड़े कि समय पर सेवा करो? क्यों? यह भाव अंदर से आना चाहिए।

उत्तम शिष्य कौन है? जिसको गुरु इशारा भी न दे और शिष्य फिर भी एकदम तीर की तरह सीधा चलता हो। गुरु कहे, ‘ सुबह चार बजे उठो’, तो वह सुबह तीन बजे उठ जाए। इसे कहते – शिष्य। नहीं तो, चार बजे उठ तो गया, लेकिन फिर जाकर दो घंटे सो गया, सुबह तो पाँच बजे उठ गये, पर फिर जाकर दोपहर में तीन घंटे सो गये। बात तो फिर वही हो गयी न! वे तीन घंटे सुबह देर तक नहीं सोए, पर दोपहर में सो गये!

अब सोना ग़लत कि सही? जो पाशविकता का जीवन जी रहा है, उसके लिए बिल्कुल सही है। पर जिसको अपनी चेतना विकसित करनी है, उसके लिए नींद दुश्मन होती है। अब, ग़लत करना है, खुशी से कीजिए। नहीं करना है, तो आग लगा दीजिए ग़लत की धारणा को भी। क्या होती है ग़लती? कुछ भी नहीं। हर बात जिसमे हमें कुछ ज्ञान मिला, वह ग़लत नहीं हो सकती। ग़लती भी ग़लत नहीं होती है, जब ग़लती को भी आप समझदारी से करते हैं, तो वह भी आपको शिक्षा दे जाती है कि जब भी जीवन में ऐसी परिस्थिति दोबारा बनेगी, तो अब आप समझदार हो गये होगे। अब आपको पता है, तो अब आप फिर से वह काम नहीं करने वाले।

तो जिसकी अकल ठीक से काम करने लग जाए, जिसने अपने अंदर के गुरु को जाग्रत कर लिया है, उसे फिर बाहरी गुरु की भी ज़रूरत नहीं रह जाती। बाहरी गुरु भी तब तक ही चाहिए, जब तक आपने अपने अंतर के गुरु को नहीं जगाया। एक बार अंतर का गुरु जग जाए, तो एक-एक पल आपके जीवन का उत्तम और श्रेष्ठ होता है। कुछ ग़लत, कुछ अशुभ, कुछ पाप हो ही नहीं सकता।

तुम्हारी मान्यताएँ, तुम्हारे दिमाग़ को किस तरह की शिक्षा प्राप्त होती है…. उसी पर निर्भर करती है। उसी के हिसाब से आपको कुछ ग़लत और कुछ सही लगता है लेकिन ज़िंदगी में जिसको धर्म की यात्रा करनी है, उन्हे सिर्फ़ दूसरों की मान्यताओं के अनुसार नहीं, बल्कि अपने ज्ञान और विवेक के आधार पर ग़लत और सही का निर्णय करना चाहिए। वह आपकी अपनी अकल, आपकी अपनी समझ होनी चाहिए जो आपको कहे कि यह सही है और यह ग़लत। नहीं तो ऐसा कोई ठोस नियम नहीं होता है ग़लत और सही के बारे में कुछ भी ग़लत नहीं है और कुछ भी सही नहीं है ।