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विचार से निर्विचारिता की ओर

“एक दिन में सारे विचारों को नष्ट नहीं किया जा सकता। मानसिक वृत्तियों की प्रक्रिया लम्बी और कठिन है।”
जिस प्रकार ईंधन के जल चुकने पर आग अपने स्त्रोत में विलय हो कर शांत हो जाती है, उसी प्रकार सभी संकल्पों और विचारों के समाप्त हो जाने के बाद मन अपने स्त्रोत आत्मा में विलय होकर शांत हो जाता है। तभी परम स्वतंत्रता या कैवल्य की प्राप्ति होती है। एक दिन में सारे विचारों को नष्ट नहीं किया जा सकता। मानसिक वृतियों की प्रक्रिया लम्बी और कठिन है। विचारों को समाप्त करने का अभ्यास करते रहें ( भले ही विचार आंशिक रूप से समाप्त हुए हों )।

अपनी आवश्कताओं और कामनाओं को कम करें। तब विचार भी कम होने लगेंगे। फ़िर धीरे - धीरे करके समूचे विचार नष्ट हो जायेंगे। विचार समुद्र की लहरों के समान हैं। उनकी संख्या अनंत है । प्रारंभ में उन्हें समाप्त करने के प्रयत्न में शायद आप निराश हो जाएँ । कुछ विचारों की लहरें उतर जायेंगी, लेकिन कुछ विचार तेज प्रवाह वाली धारा के समान फूट निकलेंगे। जिन विचारों को कभी आपने दमित कर दिया था, वे कभी दोबारा सिर उठा सकते हैं। अभ्यास करते समय कभी निराश न हों। अवश्य ही आपको आंतरिक, आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होगी। अन्तत: आपको सफलता मिलेगी। जिस कठिनाई का सामना आप अभी कर रहे हैं, उसका अनुभव प्राचीन काल के सभी योगियों ने किया है।