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जहाँ मानवीय शरीर में ब्राह्मण्ड की गूंज विद्यमान है, वहीं उसके हृदय की धड़कनों का संगीत सारी चराचर सृष्टि में प्रतिध्वनित हो रहा है। जिन पंचभूतों से मानवीय देह अस्तित्व में आई है। सारी सृष्टि को चलाने वाले नियम मानवीय जीवन पर भी लागू होते हैं ।
हम सब में प्रत्येक इस विश्वव्यापी सृजन - शक्ति का एक नन्हा अवतरण है । मानवता को इस सृष्टि से भिन्न देखना, सत्य के विरोध में खड़े होने जैसा होगा।
हम सब की उत्पत्ति उस एक ही सर्वव्यापी, सर्वशक्तिशाली व सर्वज्ञ सत्ता से हुई है । हम इस सत्य से बच नहीं सकते। हम इस सत्य को अस्वीकार कर सकते हैं। हम अपनी स्वतंत्रता के नाम पर इस सत्य से इनकार कर सकते हैं। हर किसी के पास दो आँखें, दो कान, दो नथुनें, दो बाहें, दो टांगें व एक मुँह है। हर कोई साँस लेता है, ख़ाता है और सोता है।
यही सत्य है कि मानव सार्वभौम - ऊर्जा के कारण अस्तित्व में आया है। इसलिये मनुष्य के भीतर वही ऊर्जा निहित है। जब यह अपने जन्म के सिद्धांत का उल्लंघन करता है तो यह अपनी ऊर्जा को विरोधाभासी दिशा देता है, जिसकी कीमत फ़िर दर्द , विरह , चिंता के रूप में चुकानी पड़ती है।
‘योग’ हम सब में उठती - गिरती इस ऊर्जा को दिशा देने का विज्ञान है, जो हमें वापिस अपने भीतर, अपनी निजता की ओर मोड़कर अपने निजस्वरूप के साथ समरसता देते हुए शान्ति प्रदान करता है।
‘धर्म’ बहाव है और ‘कर्म’ इस सार्वभौमिक - ऊर्जा से वापिस एक हो जाने का साधन है। इसकी सर्वप्रथम अवस्था है कि हमें इस बात का एहसास हो कि हम इसी सृष्टि के विकास क्रम का एक अभिन्न हिस्सा हैं। तभी तो हम अपने भीतर उठ रहे इन प्रतिकूल स्वरों को वापिस इस सृष्टि में हो रहे संगीत से स्वरबद्ध कर पायेंगे।
हर दिन सूर्य हम सबके लिये उदय व अस्त होता है। इसी कारण पूरे विश्व में यह अंधेरे व उजाले पर आधारित जीवन - क्रम चलता है।
सुबह पूर्वी क्षितिज में सूर्य आए, इससे ठीक 90 मिनट पहले इस पूरे ग्रह पर एक घनीभूत ऊर्जा का प्रवाह प्रवाहित होता है। सब सोये हुए प्राणी प्रमाद को त्याग कर दिनभर की क्रियाओं के लिये तैयार हो जग जाते हैं। तब सूर्योदय से करीब आधा घंटा पहले पूरे वातावरण में एक और घनी ऊर्जा का प्रवाह दौड़ जाता है। यह भी बहुत शक्तिशाली प्रवाह होता है। और यह क्षण पूरे दिन का एकमात्र महत्वपूर्ण क्षण होता है। इस क्षण में इस सृष्टि में सम्पूर्ण प्राणियों के शरीर की रासायनिक प्रणाली तय होती है। मनुष्य भी इस कर्म से प्रभावित होता है।
एक जापानी जीव - वैज्ञानिक ने यह खोज कि है कि सूर्योदय से 10 – 20 मिनट पहले सभी मनुष्यों के रक्त - संरचना में निश्चित रूप से एक अचानक परिवर्तन होता है और इसमें ताजे रसायनों का तीव्र संचार होता है, जो दिनभर काम करने की उर्जा प्रदान करता है। किंतु इनका पुनः संचार अगले दिन सुबह ही हो पाता है। हमारे शरीर व मन का स्वास्थ्य इन्हीं रसायनों से बनता है। इस तथ्य को, शरीर में कुछ बाहरी रसायनों को प्रविष्ट करवा कर परखा गया है कि किस तरह यह रसायन शरीर व मन पर अपना असर दिखाते हैं। इसीलिए यह प्रत्येक प्राणी के लिये आवश्यक हो जाता है कि वह सुबह सूर्योदय से कम से कम 45 मिनट पहले अवश्य जगे। सूर्योदय से 10 मिनट पहले विशेष ऊर्जा का संचार होता है। भले ही हम जग कर इसे ग्रहण करने के लिए तैयार हों अथवा न हों, उर्जा का संचार तो होगा ही। तो कितना अच्छा होगा कि हम जग कर इस ऊर्जा का स्वागत करने के लिए तैयार रहें।
नींद के दौरान मानव - शरीर में सारे व्यर्थ के तत्व व मल उसके मूत्राशय व मलाशय में जमा हो जाते हैं। हमारे शरीर के निचले भाग में पर्याप्त मात्रा में गन्दी हवा जमा हो जाती है, जो कि सुबह मल - मूत्र के त्याग करते समय उन्हें बाहर निकलने का काम करते है। यदि कोई सुबह इस समय सोया रह जाए, जब सारे शरीर की रासायनिक संरचना के तय होने का समय आता है, तो यह गंदगी उसकी दिन भर की ऊर्जा को प्रदूषणयुक्त बना देगी। यदि कोई जगकर, अपने पेट को साफ़ करके, इस ऊर्जा के प्रवाह को समेटने को तैयार बैठा हो, तो आप ही कहिए कि दोनों बातों में कुछ अंतर है अथवा नहीं ?
इतिहास साक्षी है कि पूरे विश्व के हर धर्म में सुबह जल्दी जगकर ताजगी से भरे हुए शरीर व मन से नए दिन के स्वागत पर जोर दिया है। हिंदू - परम्परा के अनुसार मनुष्य की 14 असफलताओं में से एक असफलता - सुबह जल्दी जागकर ध्यान न करने को गिना है।
केवल एक स्वस्थ व्यक्ति ही इस दुनिया में खुशी से जी सकता है और स्वस्थ रहने की प्रथम कुंजी ही यही है कि सुबह सूर्योदय से 10 मिनट अथवा अधिक समय पहले जग जायें। संस्कृत ग्रंथों में इस समय को ‘ब्रह्ममुहूर्त’ अथवा ‘अमृतवेला’ कहा गया है। ब्रह्ममुहूर्त का अर्थ है ब्रह्मा जी का समय अर्थात शुद्ध चैतन्यता, भगवदीय सत्ता का समय।’ अमृतवेला ‘ जीवन के अमृतरूपी क्षणों का संकेतक है।
इन निर्णायक क्षणों में शारीरिक स्वास्थ्य पर एक और नई परत चढ़ जाती है जो कि हमारी शारीरिक शक्ति व मन की एकाग्रता को द्विगुणित करती है। ऐसी ऊर्जा से भरा व्यक्ति ही किसी प्रकार के काम को पूर्णता से कर सकने की शक्ति व सामर्थ्य रखता है। इस समय पर शुरु किया गया कोई भी कार्य निश्चित ही पूरा होता है। बड़ी से बड़ी मुश्किलें, जिनमें कड़ी मानसिक अथवा शारीरिक शक्ति व्यय होने वाली हो, वह भी जल्दी से निपट जाती हैं। इस समय स्मरण - शक्ति भी खूब तेज होती है। यहाँ तक कि बीमार व्यक्ति भी, जो कि रातभर परेशान रहते जगा हो, वह सुबह की इस सुंदर वेला में गहरी व सुकून भरी नींद में डूब जाते हैं और कुछ आराम महसूस करते हैं।
केवल एक सौ वर्ष पूर्व, जब से हम सुसंस्कृत हुए हैं, तभी से सुबह जल्दी जागने को नज़र - अंदाज किया गया है। ये वही सौ वर्ष हैं जिनमें उद् घोषणा की गई कि ‘ हृदयरोग , कैंसर और दर्जनों, जन्म से लेकर बड़े होने तक की बीमारियों, मानसिक रोगों में अपूर्व बढोत्तरी हुई है। ‘
आधुनिक मानव को सुबह जल्दी उठने के महत्व को समझना चाहिए । वह अपने शरीर व मन को प्रकृति से समरस रखने के अभ्यास को भूल चुका है। वह यह भी भूल रहा है कि हर सुबह हर नए दिन की शुरुआत है। यदि हमने स्वयं को बीते कल की परेशानी में उलझाये रखना है तो नए दिन का क्या लाभ?
सबसे जरुरी बात है कि सूर्योदय से पूर्व के इन क्षणों में कुछ भी भोज्यपदार्थ अथवा पेय न लिया जाए। बहुत से लोग चाय या काफ़ी के गुलाम होते हैं। बिस्तर से पाँव निकालने से पहले उन्हें चाय चाहिए। पश्चिमी सभ्यता से प्रभावित लोगों में इस परम्परा का अधिक चलन है। परम्परागत रूप से अधिक लोग इसे ‘बैड - टी’ कहते हैं, जबकि इसे तो शारीरिक व्यवस्था के विरोध में किया गया अपराध मानना चाहिए। अपने मूत्राशय अथवा मलाशय को खाली करने से पहले इन उत्तेजक पदार्थों को शरीर में डालने का कारण क्या? सुबह के समय में हमें अपने शरीर को धीमे - धीमे व आराम से चलाना चाहिए। ये भारी उत्तेजक न केवल शारीरिक व्यवस्था को गतिमान करते हैं, बल्कि प्रदूषित हवा भी बाहर निकलने के बजाय ऊपर चढ़कर पूरे शरीर को रोगी कर देती है।
इसलिए सुबह सूर्योदय से पूर्व जागें व नए दिन की खुशनुमा शुरुआत स्वस्थ शरीर व स्वस्थ मन सहित पूरी तैयारी व उत्साहपूर्वक करें!
