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एकांतवास चित्त का शोधन

प्रत्येक व्यक्ति को कभी – कभी अकेले रहने का अवसर अवश्य ढूँढना चाहिए ।
आप अपने जीवन को देखो। पूरा समय पति – पत्नी, बच्चे, माता – पिता, भाई – बहन,
मित्र, पड़ोसी, ऑफिस, साथी; इन सबका तुम्हारे आस – पास तांता लगा रहता है। याद रहे,
जितने लोग तुम्हारे आसपास होते हैं, उन सबकी बातें सुनोगे और खाली बातें नहीं सुनोगे,
बल्कि दूसरों की गंदगी तुम्हारे भीतर जाएगी। यह गंदगी से भरे मन के साथ तुम कहो कि
सुबह में ध्यान की सिटिंग में बैठूं, तो होगा यह कि जो तुमने बातें सुनी हैं, वे सब तुम ध्यान
में दोहराते रहोगे। तुम्हारे भीतर मन रिपीट करता रहेगा कि उसने यह किया, उसने यह कहा – वह कहा।

“प्रत्येक व्यक्ति को कभी – कभी अकेले रहने का अवसर अवश्य ढूँढना चाहिए । आप अपने जीवन को देखो। पूरा समय पति – पत्नी, बच्चे, माता – पिता, भाई – बहन, मित्र, पड़ोसी, ऑफिस, साथी; इन सबका तुम्हारे आस – पास तांता लगा रहता है। याद रहे,जितने लोग तुम्हारे आसपास होते हैं, उन सबकी बातें सुनोगे और खाली बातें नहीं सुनोगे, बल्कि दूसरों की गंदगी तुम्हारे भीतर जाएगी। यह गंदगी से भरे मन के साथ तुम कहो कि सुबह में ध्यान की सिटिंग में बैठूं, तो होगा यह कि जो तुमने बातें सुनी हैं, वे सब तुम ध्यान में दोहराते रहोगे। तुम्हारे भीतर मन रिपीट करता रहेगा कि उसने यह किया, उसने यह कहा – वह कहा।”
इसलिए कहा गया कि हमारा संग सत्संगियों का होना चाहिए। अगर सत्संगी न मिलते हों, तो अकेले रहना ज्यादा बेहतर है। अभी भी देखो, शिविर में आए हो, तो एक – एक कमरे में तीन – चार जन रुके हो। तो मेरा सुझाव है कि जब आश्रम में कोई गतिविधि न चल रही हो, तो उन दिनों में आकर यहाँ रहो । कई बार लोग फोन करते और पूछते हैं कि ‘ क्या गुरुमाँ आश्रम में हैं? अगर हैं तो हम एकांतवास करने आयें।’

अगर गुरुमाँ के रहते हुए आ रहे हो, तो भी तुम्हारा एकांतवास नहीं हुआ। क्योंकि तब भी तुम ढूँढते रहोगे कि ‘ गुरुमाँ कमरे से बाहर आए कि नहीं आए? बाग़ में आयेंगे कि नहीं? मन्दिर में आयेंगे कि नहीं आयेंगे ? कब मिलेंगे, कब दर्शन होंगे? ‘ अगर यही सब खोपड़ी में घूमता रहा तो यह गुरुमाँ का संग हो रहा है, एकांतवास अभी भी नहीं हो रहा।

एकांतवास का अर्थ है कि दूसरों के साथ बातचीत न करना, दूसरों के बारे में कुछ भी नहीं सुनना। दूसरों की बात मन में भी न आए। दूसरों के आचरण के बारे में कुछ भी न सोचना। पूरा समय अपनी साधना को देना ही एकांतवास है। एकांतवास करने से साधना को जो पंख लगते हैं, सब के बीच में रहकर वह आध्यात्मिक उन्नति हो ही नहीं सकती ।

मैंने महात्माओं से यह भी सुना है कि अगर कोई व्यक्ति 11 साल के लिये एकांत में वास करे और चित्त का शोधन करे, चित्त को योग में लगाये तो आध्यात्मिक पथ पर उन्नत होता है। एक साधारण ग्रहस्थ आदमी के लिए सब कुछ छोड़ – छाड़कर 11 साल के लिये जाना तो बहुत कठिन है लेकिन महीने में कभी एक दिन, दो दिन या चार दिन तक एकांत में जाना तो कोई मुश्किल नहीं। इसलिये तुम समय – समय पर अपने एकांत को ढूंढो। मेरा यह मानना है कि जब आप कोई काम करते हो, दुकान या कारोबार; जो भी आप करते हो तो बेईमानी से नहीं करो। दिल लगाकर, डट कर काम करो, खूब पैसा कमाओ। ईमानदारी से, ढंग से पैसा कमाओ। फ़िर चार – छ: महीने में एक बार छुट्टी लेकर हफ्ते – दस दिन के लिये एकांत में जाकर एकांत का रस लो। घरवालों को भी कोई परेशानी नहीं , क्योंकि आपने खर्च करने के लिये काफ़ी धन छोड़ा, अब उसमें उनको कोई दिक्कत नहीं ।

एकांतवास में जब मन को सोचने के लिये और कुछ बचा ही नहीं, तो मन फ़िर एक का ही तो चिंतन करेगा। एकांत में जब आप रहोगे, तब मन की असल तस्वीर दिखती है कि मन किसको याद करके तड़प रहा है। अभी तो आप कहते हो ‘मेरा किसी से प्यार नहीं है ‘ यही रट लगाये फिरते हो । जरा अकेले बैठ कर देखो कि किस – किससे प्यार है । जिन – जिनसे आपका मन बंधा हुआ है, बस उन्ही की शकल आंखों के आगे घूमती रहेगी ।

स्वामी अखंडानंद सरस्वती प्रकाण्ड पंडित थे । इन्होने अपने जीवन के बारे में बताया कि इनकी शादी भी हो गई और जवान भी थे , पर इनका मन ईश्वर के प्रति ऐसा अनुरागी कि एक दिन सब कुछ छोड़ – छाड़कर अपने गुरु उड़ीयाबाबा के पास चले गए। उनसे जाकर कहा कि ‘ मैं साधू बनूँगा, घर वापिस नहीं जाऊँगा।’

बाबा ने कहा कि ‘अच्छा ठीक है, रह लो । ‘ करीब दो महीने निकले अब जब भजन करने बैठे, मन्त्र करने बैठे, तो मन्त्र कृष्ण का करने बैठे और चेहरे घर वालों के सामने आएँ।

एक दिन गुरुदेव ने पूछा – ‘ जब भजन करते हो मन लगता है? ‘और उन्होंने बताया कि मन तो घर वालों को याद करता है। तो फ़िर उड़ीयाबाबा ने कहा कि ‘ अभी तुम वापिस जाओ, अभी तुम यहाँ रहने के योग्य नहीं हो, क्योंकि जब तक मन परिवार, संसार से बंधा है, तुम यहाँ मेरे पास बैठे हो, पर इससे लाभ क्या? याद तो तुम घर वालों को कर रहे हो। अच्छा यही होगा रहो तुम घर में, याद तुम हम को करो।’

यहाँ मेरे पास एक लड़का आया है पंजाब से । रो रहा था कि वापिस नहीं जाऊँगा, यहीं रहूँगा। मैंने कहा कि मैं अभी तो तुम्हें नहीं रखती। एक – दो बार घर जाओ। अभी जो काम कर रहे हो, वह मेहनत से डटकर करो। साल दो साल मेहनत करो और दूर रहते हुए मेरे प्रति तुम्हारा प्यार जितना गहरा होगा, शायद पास आकर उतना नहीं होगा। क्योंकि जब तक मन दूर होता है, वह तड़पता है, लेकिन पास आकर तो लगता है कि अब तो आ ही गए। जब आ ही गए, तो गुरु से नज़र हट जाती है और यहाँ – वहाँ नज़र दौड़ती रहती है।

मैंने बहुत बार यह देखा है कि कोई जब तक दूर है, मन तड़प रहा है। जब पास बुला लिया तो नजरें यहाँ – वहाँ जा रही हैं। खाने पर जा रही; पीने, सोने पर नजरें जा रही हैं । हमारे स्थान पर लुभाने के लिये बहुत सा सामान है। दूसरी बात, शायद तुमको हमने बहुत जल्दी इतने नजदीक कर लिया, जब कि इतनी जल्दी मुझे नजदीक करना नहीं चाहिए था। पर क्या करें, मौका देना पड़ता है । मौके का कोई लाभ उठा ले। तो बहुत अच्छा, नहीं उठाए तो हानि किसकी?

तो अगर सब छोड़कर आ जाओ और याद करो घर वालों को, तो क्या फायदा । अच्छा यही है कि रहो घर में, और याद करो गुरु को, तो कम से कम गुरु की याद तो मन में बसी रहे। यह सच है, दूर रहने से प्यार बढता ही है, कम नहीं होता। दूर रहने से प्यार और गहरा होता है । अगर गुरु से दूर रहने से साधना गहरी होती हो तो क्या यह अच्छा नहीं है फ़िर?

गुरु के उपदेश को सुना, गुरु से ध्यान सीखा, ज्ञान लिया, पर उसकी प्रैक्टिस कहाँ करोगे? वह तो एकांत में ही होगी। आज तक आप लोगों ने कभी भी इस बारे में विचार नहीं किया, और शायद यह विचार मैंने तुम्हे दिया भी नहीं। पर आज दे रही हूँ – एकांत।

एकांत के लिये किसी पहाड़ पर जाओ या तीर्थ पर जाओ, कहीं भी जाओ, या मेरे इस आश्रम में आकर ठहरो, लेकिन एकांत का पूरा अर्थ तब होता है, जब आप पूर्ण रूप से एकांत में होते हैं, बाहर से भी और भीतर से भी। जैसे एक सज्जन कहने लगे कि मेरे माता – पिता हरिद्वार में स्थायी रूप से रहने लगे हैं। मैंने कहा कि अच्छी बात है। फ़िर उनके माता – पिता की मुलाकात मेरे से ऋषिकेश में हुई, तो मैंने देखा कि बैठे तो यहाँ है, पर यहाँ भी उन्होंने पूरी गृहस्थी बना रखी हुई है। सब बूढ़े , बुढ़ियाँ एक साथ एक कॉम्प्लेक्स में रहते हैं और एक दूसरे की निंदा करने में लगे हैं – ‘ये मेरा अपना है, यह बड़ा बुरा है।’ तो वहां भी अपना – बेगाना करके रखा हुआ है। तो सारी दुनिया , बाजार वहाँ भी खड़ा कर लिया है, तो तुम्हारा तीर्थवास कैसे हुआ फ़िर? न कोई अपना, न कोई बेगाना, न दुश्मनी, एकांत तो तभी होगा।