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शिव सूत्र

सुख दुख की लहरों का अब डर नहीं
सदा मस्त अपनी मौजों में बहते हैंI

शिव के ज़हर पीने की घटना हम लोगों के लिए एक संदेश को लिए हुए है। साधक को अपने जीवन के कड़वे, कठोर अनुभवों को, जीवन में अपने ही कर्म के अनुसार प्राप्त हुए दुखों को पीना है, ज़हर पीना है और जिसने ज़हर को भी स्वीकार कर लिया है, सच तो यह है कि उसके लिए ज़हर भी अमृत हो जाता है। और अगर कोई अमृत को भी इनकार कर दे, इनकार कर सकता है, उसके लिए अमृत भी ज़हर हो गया।

इस बात को अच्छी तरह मंथन कर लो कि तुम अपने जीवन में आए हुए संकट, विपत्तियों के प्रति किस तरह रिएक्ट करते हो। मैं आपसे पूछती हूँ- अचानक से आपको खबर मिले कि तुम्हारे किसी प्रियजन की मृत्यु हो गयी है, हो सकता है, कभी भी हो सकता है, या अचानक तुम्हें खबर मिले कि तुम्हारी बहुत भारी आर्थिक हानि हो गयी है….. तो आदमी प्रियजन की मौत को भी शायद स्वीकार कर लेगा, आर्थिक हानि हो जाए तो शायद उसको भी बर्दाश्त कर ले ……….. परंतु किसी का अपमान हो जाए, किसी के विरोध में लोग उसकी निंदा करने लगें, यह स्वीकार करना बहुत मुश्किल है। घर का कोई मर गया तो चार दिन रोकर फिर चैन आ जाएगा।

कबीर साहिब ने कहा - ‘बीवी छः मास रोती है, माँ दस साल रो लेगी, भाई चार हफ्ते रो लेगा। फिर सब भूल जाएँगे ।’

देखो, आप जितने लोग बैठे हो, आप के घर में भी तो कोई न कोई, कभी न कभी मरा होगा। जब मरा था, तब तुम भी बहुत रोए थे। लेकिन अब थोड़ी रो रहे हो, अब तो बैठे हो, हँसते हो, खाते-पीते हो, जीवन जी रहे हो, काम -धाम सब कुछ कर रहे हो। मौत को आदमी बर्दाश्त कर जाता है, धन का नुकसान हो जाए तो वह भी जैसे-तैसे बर्दाश्त कर जाता है। सोचता है कि पहले कमाया ही था, फिर कमा लेंगे। थोड़ा दिल बड़ा कर लेता है। पर किसी के नाम पर धब्बा लग जाए – यह बर्दाश्त करना अच्छे-अच्छों के लिए बहुत मुश्किल है। लेकिन ज़हर तो ज़हर ही है, ज़हर की वराएटी नहीं होती। ‘यह ज़हर पी सकता हूँ, यह नहीं’ ऐसा नहीं सोचा जा सकता। ‘मैं अपयश को भी पी सकूँ’, ‘मैं अपनी निंदा सहन कर सकूँ’, ऐसा आप क्या कर सकते हो? जब तक कोई तुम्हारी पीठ ठोकता रहता है, तुम्हें बहुत अच्छा लगता है। जिस दिन तुम्हारी पीठ कोई न ठोके, उस दिन तुम्हारे मन की सब शांति ख़त्म हो जाती है।

सबको स्तुति सुनना अच्छा लगता है। पर साधक कौन है? साधक वह है – जो अपनी निंदा को उतनी ही सहजता से सुन सके, जितनी सहजता से वह अपनी प्रशंसा को सुनता हो।

स्तुति स्वीकार कर लो, कोई महत्वपूर्ण बात नहीं। उन्नति हो तो सबको अच्छी लगती है, परन्तु जब अवनति हो और तुम्हारे मन में कोई लहर न उठे, तो तुम साधक हो। घर में किसी का जन्म हुआ, सबको खुशी होती है, सबको अच्छा लगता है। परिवार बड़ा हुआ। लेकिन जब कोई मरे, और तब तुम्हारा मन आंदोलित न हो, जिसने पिया इस ज़हर को, जिसने जीवन के इस ज़हर को पीना सीख लिया, सच यह है कि दुनिया में उसी ने जीना सीखा। पर ज़हर पी पाएगा कौन? वही जिसके भीतर हिम जैसे ठंडक हो, वही ज़हर की गरमाइश को बर्दाश्त कर पाएगा, दूसरा नहीं ।

अपयश को, अवनति को वही आदमी सहन कर सकेगा, जिसने अपने भीतर ध्यान के परम आनंद को पाया है। इतना शीतल है मन कि अब कोई कह भी दे, तो तुम आई-गई कर देते हो ।

अगर आपका मन अच्छा न हो, मन दुखी हो तो कोई अच्छी बात कह दे तो भी बुरी लगती है। और इससे विपरीत मन अच्छा हो और कोई तुम्हारी बुराई भी कर रहा हो, तो तुम उसको भी बैक-हेंडेड कॉंप्लिमेंट की तरह ले लोगे । सहज होकर जीना आदमी को आता ही नहीं। हम हमेशा चढ़े घोड़े पर सवार होते हैं । या तो सुख के घोड़े पर सवार हैं । तब भी सरपट दौड़ते हैं, रुकते नहीं, देखते नहीं, पूछते नहीं, और या दुख के घोड़े पर सवार हैं । तब तो सोचने-समझने का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि तब हम इतने गमगीन होते हैं कि अकल का इस्तेमाल ही नहीं करते। इसलिए न सुख के घोड़े पर बैठो, न दुख के घोड़े पर बैठो। बैठना ही है तो अपने आत्म-पद पर बैठो। अपनी निजता में रहो। जीवन का ज़हर जिसने सहज होकर पीना सीखा, हमने उसी को महादेव कहा ।

महादेव इसीलिए नहीं पूजे गये कि वे ज्ञानी हैं, वे इसीलिए पूजे गये कि वे जीवन के ज़हर को भी स्वीकार करते हैं। देखो, हम जब महात्मा या किसी गुरुजनों के पास जाते हैं तो कहते हैं, ‘महाराज! आशीर्वाद दीजिए कि सब सुख रहे, आशीर्वाद दें कि सब भला ही हो, सब अच्छा ही हो।’ अगर कोई दुकान खोल रहे हों तो भी कहते हैं कि ‘आशीर्वाद दीजिए कि दुकान अच्छी चले ।’ मुझे यह लगता है कि गुरुओं से यह आशीष नहीं माँगनी चाहिए। गुरुजनों से आशीर्वाद यह माँगो कि ‘हे गुरुदेव! आशीष दीजिए कि लाभ हो हानि, मैं सम रह सकूँ, अडोल रह सकूँ ।’ आशीष माँगो स्थिर होने का, टिकने का, रुकने का, संतुलित होने का।

मुझे याद आ रहा है, मेरे सन्यास-गुरु पूज्य महाराज जी अधिकतर गाँव में विचरते रहे। एक किसान उनके पास एक भैंस लेकर आया और कहता है – ‘महाराज! यह आटे का पेड़ा मेरी भैंस को खिला दीजिए ।’

महाराज कहते, ‘इससे क्या होगा?’

तो वह बोला, ‘महाराज, आपका हाथ लगेगा, मेरी भैंस दूध ज़्यादा देगी।’

अब देखो, ब्रह्मज्ञानी के पास क्या लेकर जा रहा है! पर तब समय कुछ और था, गाँव ही थे, खेत-खलिहान में बैठे रहना, कोई आ रहा, कोई भी जा रहा। महाराज हमारे फक्कड़, वे कहते, ‘मैं पेड़ा तो खिला देता हूँ, पर मैं इतना बोल दूं कि मेरे हाथ से पेड़ा खिलवाएगा, तो जितना दूध देती है वह भी ख़त्म ।’

बोले – ‘ वह इसलिए कि हमने हमारे मन से वासना और कामना की धारा को सूखा लिया है । अब तो भीतर सूखा पड़ा है । सूखे के हाथ लगवाएगा तो तेरी भैंस भी सूख जाएगी। बोल! डालूं पेड़ा?’

आशीष माँगो, तो यह कि संतुलित जीवन कैसे जिएं? आया सुख उछलने लगे, आया दुख, गमगीन हो गये। शादी में नाच रहे, कोई मर गया तो रो रहे। तुम कहोगे - ‘जो सुख-दुख में, लाभ-हानि में सम रहना सीख गया, वह तो संत हो गया। पर हम संत तो हैं नहीं ।’ तो मेरे प्यारे! यही तो कह रही हूँ कि आम आदमी क्यों रहो? तुम संत हो जाओ। और संतत्व को प्राप्त करने के लिए जो कुछ करना पड़े, करो । रामकृष्ण परमहंस, रमण महर्षि और अन्य सब जाग्रत पुरुषों जैसा तू स्वयं एक संबुद्ध, जाग्रत हो सके, कोई मुश्किल नहीं है।