संवेदनशीलता

मेरी एक संत मित्र थे विमल। गर्मी के दिन थे और हम लोग गंगा तट पर बैठे हुए थे। बड़ी ठंडी हवा गंगा तट पर बैठने से लग रही थी। यूँ तो बहुत गर्मी थी। अचानक से उसने अपने झोले से आम निकाले और आम उसने गंगा जी में उतार दिए ताकि ठंडे हो जाएँ और जब ठंडे हो गए तो उसने एक मुझे दिया एक स्वयं लिया।उसने आम हाथ में पकड़ा है और आम को देखती जा रही है। देखते देखते उसने कहा ‘ ये आम का पेड़ जाने किस किसान ने कब बोया होगा, कितने पेड़ मर मरा जाते हैं। चलते ही नही लेकिन ये पेड़ चलता रहा। सब झेल गया, आंधी तूफ़ान सब झेल गया ; मरा नहीं स्वस्थ रहा। फ़िर वह बड़ा हुआ। फ़िर उसपर फूल आए। फ़िर उस पर फ़ल लगे और जाने कितने ही बार इस पेड़ पर कितने ही फल लगे होंगे और जाने किस - किसने खाए होंगे। लेकिन यह एक आम उतरा, टोकरी में गया । टोकरी से मंडी, मंडी से ट्रेडर, ट्रेडर से रिटेलर। और फ़िर अंत में रेहड़ी वाले के पास इतने आम थे, पर मैंने चुन कर इसको निकाला और गंगा तट पर जो आम लाई हूँ और उसमे से एक आम आपको दे दिया। पर यह आम मेरे हिस्से में आया । तो ये आम मेरे तक कितनी लम्बी यात्रा कर के आ रहा है ! ‘ भाव - विभोर हो कर विमल ने कहा कि परमात्मा ने इस फल को खासम - ख़ास मेरे लिए ही उगाया था। इसको मैं कहती हूँ - संवेदनशील होना।

‘इतने खेत, इतने पेड़, इतने आम, इतने रिटेलर, इतने रेहड़ी वाले, करोड़ों आम निकलते हैं। पर उन करोड़ों आमों में से यह एक छट कर मेरे तक पहुँचा।’ बोले, ‘ भगवान ने खासम - ख़ास यह आम मेरे लिए उगाया है तो यह तो परमात्मा का प्रसाद है ‘ और वह आम से ऐसे बात कर रही थी जैसे आम उसकी बात को सुन रहा हो। और उस आम से कहती है , ‘हे राम ! जब मैं तुम्हें खाऊँगी तो बहुत रस लेकर खाऊँगी और जब तू मेरे भीतर जायेगा तो तू मेरे भीतर ईश्वरीय प्रेम को और जगा देगा। ईश्वर ने प्रसाद भेजा है और इस ईश्वरीय प्रसाद को खा कर ‘ ……. क्योंकि जो अन्न हम खाते हैं उससे न केवल हमारा शरीर बनता है बल्कि हमारे मन का भी तो निर्माण इसी से होता है । तो वह आम से प्रार्थना कर रही है कि ‘ जब तू मेरे भीतर जाए तो मेरे भीतर प्रेम बढ़े । जिस प्रभु ने तेरे शरीर को बनाया है मेरे शरीर के लिये, तो जब तू मेरे भीतर जाए तो उस ईश्वर के प्रति मेरे प्रेम को और गहरा कर देना। ‘

ख्याल रहे कोई अकल्मंद आदमी इस कहानी को सुने तो शायद कहे कि ये औरत तो पागल लगती है, आम से बात कर रही है। वह पेड़, फल से चर्चा नहीं कर रही है, उस आम के भीतर भी मौजूद भगवत्ता को और अपने भीतर भी उस भगवत्ता को महसूस करते हुए अपने मन को उस स्तर तक ले जाने की कोशिश कर रही है, जहाँ छोटे से छोटा काम भी ईश्वर स्मरण के बगैर नहीं किया जा रहा।

छोटी - छोटी बातें है, ध्यान से सुनना। कुछ खाने लगो तो उसे याद करो। ‘लुढक जाते हैं प्याले होंठों तक आते हुए भी। ‘ , यह जरुरी नहीं कि जो जाम भरा हुआ हो वह तुम्हारी प्यास बुझाए भी। ‘छलक जाते हैं प्याले होंठों तक आने पर भी ‘, भरा तुमने जाम, भरा तुम्हें अपने लिये कुछ पदार्थ पीने का और तुम लाये होंठों तक और हाथ हिल गया तो अपने ही ऊपर गिर गया।

तुमने बड़े मजे से खीर बनाई और कटोरी में डाली और इतने में एक उड़ती हुई मक्खी आई, उसे खीर बहुत पसंद आई और वह उसी में बैठ गई। बैठ गई तो उड़ ही नहीं पाई। जब तुमारी नजर पड़ी तो होंठों तक आते आते वह खीर फैंकनी पड़ी।

कुछ भी खाएं, खाने से पूर्व धन्यवाद करें, स्मरण करें। चलें या किसी को मिलें, सोयें या सोकर जगें, स्नान करें, वस्त्र पहने ,हर कर्म में ईश्वर का स्मरण साथ चलता रहे। गन्दी आदतें भी सीखी हैं न तुमने, तो यह भी सीखो । किसी ने दिया कुछ तुम्हें, तुम गप से खा गए। किसी ने कुछ कपड़ा भेंट किया तो उसमे भी खोट निकाल दिया। प्रशंसा करनी सीखो। ‘ जो है सो बहुत अच्छा ‘ कहना सीखो। ‘ जो हो रहा है अच्छा हो रहा है ‘ कहना सीखो। कहने से भी अधिक आवश्कता है कि तुम उसे महसूस करना सीखो।