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स्वयं ही खोजना होगा

” कौन हूँ ‘ मैं ‘? और परमात्मा से मेरा क्या सम्बन्ध है?”

शब्दों से तो मैं पता नहीं कितनी बार बोल चुकी हूँ। पर शब्द काफ़ी नहीं है, यह इसी से साबित हो रहा है। इसलिए मैं नहीं बोलूंगी कि तुम कौन हो। क्योंकि जो खोजने निकलेगा, असलीयत में वही पायेगा। लेकिन जो खोजने से डरेगा, वह कुछ भी नहीं पायेगा। तो खोजने से चूको मत। खोजो ! ढूँढो उस निराकार को, जो तुम्हारे ही भीतर है। ढूँढो ! ढूँढो ! उस अरूप परमेश्वर को, जिसके यह सारे ही रूप हैं ।अब, शुरु करना हो ढूँढना तो कहाँ से करें ? दो ही जगह हैं , जहाँ से तुम शुरु कर सकते हो। एक – भीतर खोजो । तो तुम्हारा मन। मन से खोजो। दूसरा – बाहर सदगुरु। सदगुरु से खोज शुरु करें। कैसे? सदगुरु के वचनों को आधार बनाएँ चिंतन करने के लिए और ध्यान के औज़ारों के साथ अन्दर के खजाने की खुदाई शुरु कर। ध्यान औज़ार है तुम्हारे भीतर की खुदाई करने के लिए, जिससे कि तुम अपने ही भीतर पड़े हुए खजाने को खोज सको।

इसलिए ध्यान और विवेक इन दो औज़ारों का अच्छी तरह उपयोग करो। दोनों का उपयोग करो। ये दोनों ही औज़ार सदगुरु से मिल सकते हैं। फ़िर कह दूँ , ‘ सदगुरु से मिलते हैं ‘ का मतलब ऐसा नहीं है कि सदगुरु किसी चीज की तरह ये औज़ार किसी – किसी को भेंट में देगा और किसी – किसी को नहीं देगा। जो ले सके उसी को देता है।

भाई, हमने तो हमारी दुकान सजा दी। अब हमारी दुकान के जो सौदे हैं, वे सौदे तुम तब ही हासिल कर सकोगे, जब उनकी कीमत अदा करोगे। तो कीमत अदा करो और माल उठाओ। ईमानदारी, मुमुक्षता, निरपेक्ष प्रेम, अंहकार का प्रेमपूर्वक समर्पण – यही है कीमत। यही मोल है हमारे सौदों का।

एक समर्पण होता है तकलीफ वाला। बड़ा डरता है बंदा। समर्पण करना नहीं चाहता था, पर करना पड़ रहा है। कई लोग गुरु कि शख्सियत के द्वारा धारे जाते हैं । चाहते नहीं थे वे समर्पण करना, पर गुरु अपनी ताकत से उनसे जबरदस्ती समर्पण करा लेता है । पर मैंने यह भी देखा है कि इस तरह गुरु किसी को अपनी शक्ति से चमत्कृत करके अपना बना भी ले, तो भी उसका दिल अन्दर से अगर इस बात के लिए राजी न हो, तो आज नहीं तो कल वह फ़िर कभी न कभी पीछे हट जाता है, बिल्कुल हट जाता है।

गुरु लोग, फ़कीर लोग कभी – कभी कृपा करके किसी का दिल खींच लेते हैं अपनी तरफ़। लेकिन फ़िर सच्ची बात तो यह भी है कि मजा तो इसी में है, जहाँ फ़कीर को मेहनत न करनी पड़े तुम्हारे लिए और जाकर ख़ुद अपना दिल रख दो उसके क़दमों में। तो ही बात ज्यादा अच्छे ढंग से हो जाती है, क्योंकि उसमें फ़िर तुम ख़ुद निर्णय लेते हो समर्पण का।

इतना आसान भी नहीं है यह खेल। फ़िर यह भी कह दूँ, वह चाहे गुरु की तरफ़ से कृपा हो जाए, या चाहे आप ही ख़ुद यह निर्णय अपनी तरफ़ से ले लें, लेकिन किसी भी तरीके से गुरुचरणों में मन अटक जाए, सद्गुरु के साथ मन अटक जाए, तो इस मार्ग की यात्रा सुखद हो जाती है। कुछ आसान हो जाती है। इस राह पर चलना है तो बहुत मुश्किल, निश्चित ही मुश्किल है। लेकिन प्रेम और समर्पण की वजह से यह आनन्ददायी हो जाता है।

सदगुरु से प्रेम करते – करते कब माँ – पिता, भाई – बन्धुओं से, घर – परिवार से मन हट जाता है, इसका पता भी नहीं चलता। फ़िर एक समय ऐसा आता है की हृदय से टलता ही नहीं उसका ध्यान। कहाँ थी वह स्थिति जब ध्यान लगता ही कोई नहीं था, और कहाँ कि यह स्थिति कि ध्यान हटता ही कोई नहीं ।