मेरा मिटना उसकी कीमत

बुद्ध के शिष्य हुए बोधिधर्म। बुद्ध के शरीर छोड़ देने के बहुत समय बाद बोधिधर्म हुए । वे बुद्ध के ज्ञान का उपदेश देने के लिये चीन की और गए। बड़ा कठिन रस्ता, हिमालय की चोटियाँ, आज भी कोई कहे कि पैदल पार करके वहां चला जाऊँ, तो आज भी दिक्कत।

लेकिन बोधिधर्म हाथ में एक डंडा लिये हुए, बस एक वस्त्र पहने हुए, वह माइनस 30 डिग्री की बर्फ पर पैदल चलकर कितनी मुश्किल से वहाँ पहुंचे, और वहाँ जाने पर वहाँ के बादशाह ने उसका सत्कार किया, सम्मान दिया, कि आपने कृपा की जो हमारे पास आए।

बोधिधर्म ने कुछ दिन वहाँ बिताये, उसके बाद पहाड़ के एक कंदरा में रहने लग गए। वे बहुत लोगों को मिले बहुत से सूत्रों का प्रचार भी किया। उपदेश भी दिया, पर कुछ ही दिन में वे इस कंदरा में मुहँ दीवार की ओर करके बैठ गए।

बोधिधर्म को कोई मिलने जाता तो ऐसे ही बैठे रहते। किसी से बात ही न करते थे। एक दिन वहाँ के बादशाह ने पूछा कि ‘यह क्या तरीका है? आप हमसे बात भी नहीं कर रहे, हमारी तरफ़ मुहँ भी नहीं कर रहे।’

बोधिधर्म ने कहा - ‘मैं यहाँ समय बेकार करने नहीं आया, मैं ऐसे शिष्य की इंतजार कर रहा हूँ, जिसको मैं अपना बोध दे सकूँ। जब तक वह शिष्य यहाँ नहीं आएगा, तब तक मैं दीवार को देखना पसंद करूँगा, तुम लोगों की शक्लें भी नहीं देखूंगा।’

छ: साल तक वह दीवार की तरफ़ मुहँ करके बैठे रहे। छ:  साल के बाद एक युवक आया, जिसका नाम था हुइमैंग। इसने आकर प्रणाम किया, और बैठ गया । पर बोधिधर्म ने उसकी ओर पलटकर देखा भी नहीं।

हुइमैंग ने कहा, ‘गुरुवर ! मैं आपके पास कुछ लेने आया हूँ, कुछ देने आया हूँ । लेने आया हूँ तुम्हारा सर्वस्व, और देने आया हूँ अपना सर्वस्व। सौदा न घाटे का है, न नफ़े का है, यह सौदा बड़ा अजीब है। दूंगा अपना सब कुछ, और लूँगा आपका सब कुछ।’

बोधिधर्म फ़िर भी नहीं पलटे। उसने कहा कि ‘ अब अगर नहीं पलटोगे तो मैं अपना हाथ काटकर तुम्हारी गोद में फेंक दूंगा। ‘ बोधिधर्म फ़िर भी नहीं पलटे। उसने हाथ काटकर बोधिधर्म के आगे फेंक दिया। बोधिधर्म अभी भी नहीं पलटे।

हुइमैंग ने कहा कि ‘गुरुवर! अगर अब आप नहीं पलटे तो अगली बार मैं अपनी गर्दन काट दूँगा, क्योंकि उस जीवन का भी क्या फायदा, जिस जीवन में बोध ही नहीं है। उस जीवन का भी क्या लाभ, जिस जीवन में समाधि ही नहीं है। इसलिये आपको मेरी ओर देखना ही होगा।’

जब हुइमैंग ने हाथ में तलवार लेकर अपना हाथ उठाया अपनी गर्दन की ओर, तब बोधिधर्म पलटे, ओर कहते कि बस। इतनी दूर कठिन यात्रा करके आया हूँ जिसके लिए, आज तुम आए हो, तो अब रहो मेरे पास। मेरे सान्निध्य में रहो। ‘

हुइमैंग ही बोधिधर्म का एकमात्र शिष्य हुआ। जैसे जलते हुए दीपक से ज्योति उछलकर अनजले दीपक के पास पहुँच जाती है, इसी तरह से बोधिधर्म का बोध हुइमैंग को मिल गया। ख्याल करना, बोधिधर्म को सुनने वाले सैंकड़ों, हजारों लोग तब भी थे। पर बोधिधर्म के धर्म को सिर्फ़ हुइमैंग ने ही पाया।

यह बात तब सत्य थी, वही बात आज भी सत्य है। सुनने वाले सैंकड़ों, हजारों हैं, पर सत्य का बोध जिन तक पहुँचता है, वे बहुत कम लोग होते हैं।