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गुरु शिष्य की मर्यादा
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काम - एक शक्ति
शिव सूत्र
गुरु शिष्य की मर्यादा
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानीनस्तत्त्वदर्शिन:
ज्ञान किसको मिलता है ? जो श्रद्धाभाव से शरणागत हो और अपना आप समर्पित करके गुरु के समक्ष कहे कि मुझे ज्ञान दें, तभी तत्व - दर्शन होता है। दूसरी मर्यादा यह कि जब गुरु तुम्हें ज्ञान समाप्त करे माने पूर्णाहुति करें तो शिष्य होने के नाते गुरु - चरणों में भेंट समर्पित करे। भेंट क्या हो ? जो वस्तु तुम्हें सब से प्रिय हो वही भेंट करो।
राजा जनक अष्टावक्र जी के पास ज्ञान लेने आए तो राजा जनक ने मर्यादानुसार फूल माला गुरु - चरणों में अर्पित करके पूजन किया, आरती उतारी। फ़िर बोले कि ‘ मैं आपको क्या भेंट दूँ ? ‘ तब अष्टावक्र जी बोले ‘ भेंट अपनी इच्छा अनुसार दी जाती है। ‘
यह सुनकर राजा बोले कि ‘प्रभु मैंने अपना तन, मन, धन सब आपको दिया। ‘ गुरु बोले कि ‘ मुझे स्वीकार है। ‘
फ़िर सत्संग शुरु हुआ। जब समाप्ति हुई राजा प्रणाम करके चल दिए तो तब अष्टावक्र बोले कि राजन कहाँ चले? तो राजा बोले कि ‘अपने घर। ‘ गुरु ने कहा कि ‘ इतनी जल्दी बदल गए, अभी तो तुमने सबकुछ मुझे अर्पित कर दिया था। फिर अब मेरी इजाज़त के बगैर कैसे जाओगे? ‘
राजा को एहसास हो गया कि हाँ महल तो मेरा नहीं। फिर अष्टावक्रजी बोले कि ‘ राजा तुमने अभी और भी बेईमानी की है, तुमने मुझे मन भी दिया था, फिर तुम्हारे अन्दर यह संकल्प कैसे उठा कि तुम यहाँ से जाओ? बात पैसे की नहीं और न महलों की है। जब तुमने कहा कि मन आपको दिया तो दिया। तो इस मन में आज के बाद संकल्प वही उठता जो मैं कहता, मेरे इच्छा के बिना कोई विचार तुम्हारे मन में न उठे। ‘
स्वामी रामतीर्थ ने अपने एक भाषण में कहा कि ‘यदि किसी को कुछ भेंट देनी हो जो सबसे प्यारी चीज़ हो वो भेंट में देनी चाहिए। अत: मुझे अपना आप सबसे प्यारा था इसलिए मैंने वही उसको दे दिया। मेरी मैं तो अब मेरी है नहीं , यह तो अब उसकी हो गई। ‘
मर्यादा यह कहती है कि जिस व्यासासन पर विराजमान गुरु से सत्संग सुनो तो उस सत्संग की पूर्णाहुति होने पर यथाशक्ति अपना भाव, अपनी श्रद्धा के फूल गुरु - चरणों में भेंट करने चाहिए। पिछले दिनों मेरे मन में आई थी और कहा भी कि उस मर्यादा का पालन न तो हम स्वयं करते हैं और न दूसरों को करने देते हैं। इसलिए इस साल हम इस वर्ष की गुरु - पूर्णिमा एक अलग ढंग से मना रहे हैं । गुरु - पूजा माने - गुरु की पूजा । यह दिन तो शिष्य के अधिकार , शिष्य के भाव, शिष्य के समर्पण का दिन है। अत: पूजा शिष्य ही करें। इस दिन जो मुझसे दीक्षित हुए हैं केवल उन्ही को पूजन करने का अधिकार है ।
गुरु और शिष्य का सम्बन्ध इतना अद्भुत है जिसको परमात्मा की प्यास हो और उसने खोजा हो और फ़िर बहुत प्रयास करके मिला हो तो वह गुरु की कीमत समझता है। घर - द्वार छोड़ कर गुरु के द्वार पर भिक्षुक बन कर बैठे और उनका अपमान भी सहे, फ़िर खाने की, पीने की चिंता किये बगैर केवल ज्ञान की प्यास, ब्रह्म की प्यास जिसके मन में जागी, वही गुरु का ज्ञान पाने का अधिकारी है ।
एक संत पिछले शिविर में भी आए थे और इस शिविर में भी आए हुए हैं । चूँकि उनका मौन है तो उन्होंने लिख कर पूछा कि ‘ सम्माननीय गुरुमाँ समय का खेल निराला है। आप के संपर्क में आए अभी थोड़ा ही वक़्त हुआ है। लेकिन आपकी वाणी का जादू ऐसा चला मुझ पर कि इसमें मैं फँसकर रह गया हूँ। अब निकलना मुश्किल हो गया है। जैसे प्रभु की इच्छा। लम्बी बात - चीत करने की इच्छा है लेकिन समय की सीमा है और मेरा मौन भी बाधक बनता है। केवल लिख कर ही आदान - प्रदान सम्भव है। दिल तो कहता है आपकी निकटता बनी रहे, आपके द्वारा अध्यात्म का स्वाद मिलता रहे और आपके दर्शन होते रहें। हम समर्पित भाव से यह इच्छा रखते हैं कि इसमें हम पूरे उतरें।
गुरु - शिष्य के सम्बन्ध में जो श्रद्धा, प्रेम और समर्पण चाहिए वह उनमें मौजूद है और अभी खोज कर रहें है । पिछले चार साल से मौन है। तुम तो एक दिन भी मौन नहीं रह सकते हो। यह चार साल से अपने भीतर खोज कर रहें हैं कि कोई राह मिले। ऐसे खोजी व्यक्ति ही गुरु की कद्र करते हैं। गुरु क्या है? गुरु - तत्व कौन है ? ये ऐसे खोजी व्यक्ति ही पहचान पाते हैं और उन्ही को इसका लाभ भी मिलता है ।
खोजी होए तो तुरत ही मिलयो, पलभर की तलाश में
कहत कबीर सुनो भाई साधो, सब श्वासों की श्वास में
मोको कहाँ ढूँढे रे बन्दे, मैं तो तेरे पास में ।
जो कोई खोजी है उसको तुंरत मिलूं क्योंकि मिलूं क्या वह तो मेरे भीतर ही समाया हुआ है ।
‘ चिदानंद रूप: शिवोहं शिवोहम् ‘
लेकिन इस चिदानंद रूप का बोध तब तक नहीं होता जब तक गुरु के ज्ञानरूपी कुंजी से तुम्हारे भीतर का द्वार नहीं खुलता। इसीलिए गुरु की आराधना ब्रह्मरूप से, विष्णु रूप से, शंकर से की गई है । हमें किसी भी अन्य देवता के पूजन की जरुरत नहीं है । गुरु के चरणों में नतमस्तक हुए मानो तैतीस करोड़ देवी - देवताओं का चरण - स्पर्श हो गया। ऐसी अद्भुत है, गुरु की महिमा।
गुरु हो अष्टावक्र जैसा और शिष्य हो राजा जनक जैसा, तभी सुनते - सुनते आत्मभाव की स्थिति में पहुंचकर शिवोहम् की अनुभूति होती है। फ़िर गुरु, गुरु न रहा और शिष्य, शिष्य न रहा। जैसे जीव - ईश्वर का भेद मिट गया । अब न कोई गुरु न कोई शिष्य जब तक साधना के मार्ग पर चल रहे होते हैं तब तक गुरु की पदवी बहुत ऊँची मानी जाती है। शिष्य अपनी श्रद्धा, अपना प्यार, अपना समर्पण, अपनी पुकार व प्रार्थना गुरु के समक्ष रखता है और गुरु करुणा व प्यार करके सन्मार्ग पर चलता है अर्थात् ये परस्पर लेन - देन होता है। फ़िर यह लेन - देन करते - करते एक ऐसी स्थिति आती है कि जिस बात की इच्छा लेकर शिष्य गुरु के पास आया था और उस ऊँची स्थिति पर पहुँचते ही -
गुरु , गुरु , गुरु कर मन मोर
गुरु बिना मैं नाहीं होर ।
इस स्थिति में आते ही गुरु शिष्य दो नहीं रह जाते वे एक ही हो जाते हैं ।
