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माघी महीना – मकर संक्रांति उपदेश

हमारी बुद्धि पर छाया आने का अर्थ है कि विवेक की शक्ति कम होगी। शरीर पर छाया आने का अर्थ हुआ कि इस शरीर की ऊर्जा कम होगी। वैसे भी बाहर शीतलता है, सर्दी है, ऊपर से अगर शरीर में भी ऊर्जा कम होगी तो अस्वस्थता का कारण अधिक बन जाएगा।
माघी महीने में मकर संक्रांति के लिए प्रावधान दिया गया कि आज के दिन गुड़ की बनी रेवड़ी खाओ भी और दान भी करो। अब गुड क्या है? गुड गन्ने से आया। गन्ना क्या है? रस है, पकाया गया है, गन्ना ऊपर की और उठता है। सूर्य के ताप से यह पका है इसमे रस भी है। सूर्य का ताप तो है इसमे, पर मिठास भी है।
तिल को भी हम चिन्ह मानते हैं और उसी का इस्तेमाल करते हुए गुड और तिल के बने हुए प्रसाद को बाँटना, तिल का दान करना, ऐसा ज्योतिषी और पंडित लोग भी बताते हैं।
माघी महीने में नित्य प्रति स्नान करके भगवान के मंदिर में, अपने गुरु
के पास अवश्यमेव जाओ, उनका दर्शन करो और प्रार्थना करो
कि आने वाले इस माघी महीने का कोई दुष्प्रभाव हमारी
बुद्धि और हमारे शरीर पर न आए।
वैसे तो रोज़ ही जल्दी उठना चाहिए, पर कहा गया है कि इस दिन तो ज़रूर उठो और माघी महीने में नित्य प्रति स्नान करके भगवान के मंदिर में, अपने गुरु के पास अवश्यमेव जाओ, उनका दर्शन करो और प्रार्थना करो कि आने वाले इस माघी महीने का कोई दुष्प्रभाव हमारी बुद्धि और हमारे शरीर पर न आए।
लगभग सभी धार्मिक पर्वों पर कुछ न कुछ दान करने की बात इसमे जोड़ दी गयी है। तो मकर संक्रांति के दिन तिल का दान करो, अन्न का दान करो, जल अपने अंदर सूर्य की किरणों को समाहित करता है, इसलिए जब आप बहते हुए जल में स्नान करेंगे तो एक तो शरीर को इम्यूनिटी मिलती है खुले में नहाने से घर के तापमान में बैठने के बजाए नदी में स्नान करने से एक खुली हवा मिली, दूसरा ठंड भी होती है। अब ऐसे ठंडे जल में आप जब स्नान करते हैं तो शरीर को एक प्राकृतिक ट्रीटमेंट मिल जाएगा। और सूर्य की रश्मियों का सबसे अधिक प्रभाव पहले जल में आता है क्योंकि पानी उसको जल्दी जज़्ब कर लेता है।
इसीलिए कहा गया है कि माघी के महीने में किसी सरोवर, किसी तीर्थ, किसी देवालय में सुबह स्नान करो, फिर अपने सदगुरु के पास जाओ। जिस स्थान पर पवित्रता है, उसी स्थान को हम भगवान का स्थान कहते है । ऐसा नहीं कि भगवान सर्वत्र नहीं है, वह है । लेकिन जहाँ सामूहिक रूप से एक साथ मिलकर सत्व गुण की भावनाओं के साथ, सुंदर भावनाओं के साथ बैठते हैं तो उसकी वाइब्रेशन ही कुछ अलग होती हैं ।
जैसे आश्रम में इस हाल की ऊर्जा बिल्कुल अलग है, पतंजलि की ऊर्जा बिल्कुल अलग है । तो यह जो दो स्थान हैं और तीसरी मधुशाला – इन तीन स्थानों में थोड़ा बहुत कम या ज़्यादा का अंतराल है, लेकिन तीनों स्थान बहुत ऊर्जामयी है । चौथा – देवालय जो शिवमंदिर है, शिवमंदिर की ऊर्जा तो अपने आप में बहुत दिव्य है, तो आश्रम में कुछ-एक स्थान ऐसे हो गये हैं जहाँ पर निरंतर, निरंतर दैविक ऊर्जा का प्रसार हो रहा है ।
धर्मस्थान मंदिर, गुरुद्वारे जाना इसलिए अच्छा है क्योंकि वहाँ पर आपको जो ऊर्जा का सघनरूप मिलता है, किसी अन्य जगह नहीं मिल मिल पाएगा। यह बात अलग है कि अक्सर मंदिरों में शोर-शराबा चलता रहता है तो बस घंटी बजाओ, प्रसाद चढ़ाओ और वापिस आ जाओ। वहाँ पर इतनी सुंदर ऊर्जा का निरूपण हो नहीं पाता है। लेकिन फिर भी कुछ-एक ऐसे सुंदर स्थान होते हैं जहाँ पर ऊर्जा का बड़ा अच्छा सघन रूप बन जाता है।
श्रीगुरुग्रंथ साहिब में गुरु नानक और गुरु अर्जन देवजी ने इन्हीं 12 महीनों पर अपने विचार कहे। इसलिए आज मैं आपको माघी महीने के संबंध में जो गुरु अर्जन देव ने शब्द दिया है, उसी को कहती हूँ –

माघि मजनू संग साधुआ
धूडि करी इसनानु..
हरी का नामु धीयाई सुनी
सभना नो करी दानु..
जन्म करम मलु उतरे
मनते जाई गुमानु ..
कामी करोधी न मोहिए
बिनसे लोभू सुआनू ..
सचेई मार्गी चल्दिया
उसतती जहानू..
अठ सठी तीरथ सगल पुन्न
जीअ दैया परवाणु..
जिस नो देवे दैया करी
सोई पुरखू सुजानू ..
जीना मिलिया प्रभु आपना
नानक तिन कुर्बाणू..
माघि सुचे से कां ढी आही
जिन पूरा गुरु मीहारवाणु ..
माघि मजनू संग साधुआ
धूडि करी इसनानु..
कहते हैं कि माघी महीने में साधुओं का संग करो। उनकी चरण धूलि में स्नान करो। इसको थोड़ा समझें! अब धूल में स्नान तो हो नहीं सकता, पर वह कह रहे हैं कि धूल में स्नान करो। एक धूल वह है जो पैरों से उड़ती हैं – माने मिट्टी, दूसरी धूलि है – शब्द। इस समय मैं जो बोल रही हूँ, वह शब्द उड़-उड़कर तुम पर पड़ रहे हैं, शब्दों की वाइब्रेशन, मेरे शब्दों की ऊर्जा जो आप पर उड़-उड़कर पहुँच रही है, जो मैं अभी बोल रही हूँ।
साधू की चरण-धूलि में स्नान करो। मतलब साधू के शब्दों को श्रवण करो और उन शब्दों की वर्षा में स्नान करो। केवल आज के ही दिन नहीं कि आज मकर संक्रांति है।








