मेरा जीवन ही मेरी पाठशाला

एक दिन सुकरात अपने विद्यार्थियों के साथ बैठे थे और उनकी पत्नी अंदर रसोई में चीख - चिल्ला रही थी। उस समय सुकरात अपने विद्यार्थियों को कुछ समझा रहे थे और सोच रहे थे की यह पाठ्यक्रम खत्म हो जाए, तब अंदर जाता हूँ। लेकिन पत्नी इतनी गुस्से से बाहर आई और सुकरात पर न केवल गालियाँ बरसाई बल्कि उबलता हुआ पानी सुकरात के ऊपर डाल दिया। अब उबलता हुआ पानी गिरने से सुकरात को तकलीफ तो होनी ही थी। यह देख उनके विद्यार्थियों को गुस्सा बहुत आया और बोले कि गुरुदेव! ऐसी राक्षसी, ऐसी कठोर, ऐसी जालिम पत्नी के साथ आप रहते ही क्यों है, आप इसे छोड़ क्यों नहीं देते ?

सुकरात हंसकर कहते हैं कि ‘ मेरी बात सुनो आज तक सुना था कि ‘ जो गरजते हैं वो बरसते नहीं ‘ पर देखो! यह गरजी भी, और बरसी भी। इसने दोनों काम कर दिए और मुझको जीवन का, ज्ञान का पाठ मेरी पत्नी दे रही है । यह तो मेरी गुरु है। इसलिये मुझे इससे बिल्कुल अलग नहीं होना। ‘

अब देखो कहाँ से आ रहा सुकरात का ज्ञान? सुकरात को ज्ञान उसकी पत्नी दे रही है। आप अगर सीखना चाहते हो विषम , कठोर, प्रतिकूल परिस्थितियों में भी अपने जीवन को आनंदपूर्वक जी सकते हो। और अगर तुम्हें जीना नहीं आता है तो तुम कहो कि जंगल में बैठ जायें, गुफा में बैठ जायें वहां आनंद रहेगा, वहां बड़ी शान्ति रहेगी; यह तुम्हारी भूल है।