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योग निद्रा - स्वस्थ जीवन का मंत्र
काम से लड़ो मत
काम - एक शक्ति
शिव सूत्र
सान्निध्य

परेशान होना आदमी का स्वभाव हो गया है। परेशानी में जीना आदमी की आदत हो गई है। शांत चित्त! लगता है, यह कोई बुद्ध, कोई महावीर, कोई तीर्थंकर, कोई गुरुनानक ही हो सकते हैं, हम थोड़े हो सकते हैं । गहरा ध्यान तो ऋषि लोग, त्यागी, मुनि लोग ही कर सकते हैं, हमारे करने की चीज़ नहीं है।
परन्तु क्या यह करना इतना मुश्किल है ? हम लोग इतना गंभीर हो चुके हैं, अपने जीवन को हम इस तरह तनाव से भर रहे हैं, ख़ुद तो तनावशील हैं ही ; अपने आस - पास बच्चों में वही गन्दी हवा हम उनको भी दिए जा रहे हैं। उनकी इस तकलीफ में बड़े लोगों का, माता - पिता का, परिवार का, समाज का पूरा योगदान हो रहा है।
अजब बात है रोना मुश्किल होना चाहिए था, हँसना नहीं। शांत होना सहज होना चाहिए, व्यथित होना नहीं । परन्तु आज व्यथित होना सहज है। इसलिये तुम्हारा मूड बात - बात पर बिगड़ जाता है। बात - बात पर चिड़ जाते हो, बात - बात पर गुस्सा आ जाता है, बात - बात पर डिपरेस्ड हो जाते हो।
आज इंसान जिस तरह से जी रहा है, यूँ कह सकते हैं कि या तो वह आत्महत्या करने की कगार पर है या पागल होने की कगार पर है। बाहर सड़क पर खड़े हो जाइये और आधा एक घंटा आते - जाते लोगों को देखिये, उनके चेहरे देखिये। तुम्हें एक मुस्कुराता हुआ चेहरा नहीं मिलेगा। भाग रहे हैं भाग रहे हैं। एक स्वस्थ जीवन की शैली में भागना भी है, पर भागने से तनाव या भागने से तुम्हारा चेहरा ही बिगड़ जाए!
हालत तो यह हो गई है कि कई लोग तो जीवन में एक ही बार मुस्कुराते हैं, और वह भी तब जब फोटोग्राफर कहता है, ‘ स्माइल प्लीज’ । अगर कोई यह कहने वाला न हो तो कोई मुस्कुराएगा भी नहीं। कई तो इतने ला - इलाज हो चुके हैं कि ‘ स्माइल ‘ कहने पर भी उनके कोई मुस्कान नही आती। तो फोटोग्राफर्स ने नया शब्द इस्तेमाल करना शुरु कर दिया वे कहते हैं बोलो - ची…….. ज़ । लंबा करके बोलो, छोटा नहीं बोलना। ‘ चीज़ ‘ कहने के लिये होंठ लंबे करने ही पड़ेंगे, मुहँ खोलना ही पड़ेगा।
इतना मुश्किल हो गया है आज मुस्कुराना । ध्यानस्थ रहते हुए एक गंभीरता आती है, लेकिन ये गंभीरता मुर्दे जैसी ठंडी नही होती, उसमे भी एक गर्माइश होती है । उसमे भी एक प्रेम का ओज होता है। हँसी तो आज आदमी के लिये इतनी मुश्किल हो चुकी है, कि हंसने के लिये उसे लाफ्टर शो देखना पड़ता है या हंसने के लिये उसे लाफ्टर - क्लब में जाना पड़ता है । हँसना भी एक्सरसाइज़ कर दिया गया है ; ‘ दस बार हो गया, छुटी, चलो अपने - अपने काम पर ‘ । हंसने के लिये भी किसी एक जगह पर जाना पड़ता है।
जितना - जितना तुम
अपनी ग्रंथिओं से
मुक्त होते चले जाओगे,
उतना - उतना तुम्हारा ध्यान
गहरा होगा। जितना - जितना
ध्यान गहरा होगा; भीतर एक
स्थिर शान्ति, एक स्थिर
ठंडक बनी ही रहेगी।
हंसने के लिये कारण खोजना पड़ता है कि किसी कारण से तो हम हंस सके। इससे ज्यादा गरीबी और क्या हो सकती है? इससे ज्यादा मजलूमियत और क्या हो सकती है, और इससे ज्यादा मनहूसियत और क्या हो सकती है?
ध्यान ! ध्यान में तुम जब भी प्रविष्ट होना, याद रखना, ध्यान के साथ तुम खेलना। फ़िर क्या होगा? जितना - जितना तुम अपनी ग्रंथिओं से मुक्त होते चले जाओगे, उतना - उतना तुम्हारा ध्यान गहरा होगा, जितना - जितना ध्यान गहरा होगा; भीतर एक स्थिर शान्ति, एक ठंडक बनी रहेगी।
आज कुछ एक पत्र मैंने देखे ; एक ने कहा - ‘ आज लग रहा था कि न तो हम शरीर में है न हमारा मन कुछ बचा है । एक अदभुत स्थिति रही है। क्या आपकी मौजूदगी में इस तरह हुआ है? क्योंकि घर में जब भी ध्यान करने की कोशिश करते हैं तो इस तरह की अनुभूति नहीं होती। ‘

ठीक भी है , शुरुआत में इस तरह ही होगा। मेरे साथ करोगे तो गहरा उतरेगा । अपने आप करोगे, शायद उसका आधा रह जाए । किसी - किसी का दस प्रतिशत ही रह जाता है। जैसे बच्चा कमजोर हो, अभी उसके पाँव में इतना बल न आया हो तो वह सहारा लेकर ही चल सकता है। तुमने देखा, डेढ़ - दो साल के जो बच्चे होते हैं , कई बार वे बैठे रो रहे होते हैं । पूछो की क्यों रो रहे हो, कुछ खाना पीना है ? क्यों रो रहे हो ? तो माएं कहती हैं कि यह चलना चाहता है। अपने आप चल नहीं सकता तो यह बुला रहा है कि ‘ मेरा हाथ पकडिये, मुझे खड़ा करिये और चलाइये। ‘ दो चार कदम चलते - चलते बीच - बीच में माँ हाथ छोड़ देती है, बच्चा गिर भी जाता है; फ़िर कभी दो - चार कदम ठीक से चल जाता है, फ़िर गिरने लगता है तो माँ पकड़ लेती है । फ़िर उसको चलाती है । तो ऐसे ही गिरते - चलते, गिरते - चलते पाँव में एक दिन पूरी शक्ति आ जाती है और फ़िर अपने आप वह चलता ही नहीं, फ़िर तो दौड़ता भी है ।
ठीक इसी तरह से ध्यान के इस पथ पर शुरु - शुरु में तुम्हारी हालत भी उसी बालक की तरह होती है। जब सहारा मिलता है, सान्निध्य मिलता है तो ध्यान गहरा जाता है। जब सान्निध्य नहीं मिलता, जब ध्यान मेरे साथ नहीं कर रहे होते हो; अपने आप कर रहे होते हो, तो गिर जाते हो। थोड़ी ही देर कर पाते हो, ज्यादा देर नहीं कर पाते हो। उतना अच्छा नहीं लगता, उतना गहरा नहीं होता। पर इस तरह की बैठकों में बैठते - बैठते, साथ ध्यान करते - करते, फ़िर भीतर सध जाता है। जिस दिन भीतर सध गया, तो मैं सामने होऊं या न होऊं ; इसमे कोई फ़र्क नहीं रह जाएगा।
सच कहूँ, मैं तो ख़ुद इंतजार कर रही हूँ उस दिन का, जिस दिन तुम्हें मेरी जरुरत भी न रह जाए। स्वावलंबी हो जाओ, स्व: निर्भर हो जाओ। लेकिन शुरुआत में साथ बैठने पर अनुभूति गहरी होगी ही; इसमे कोई दो राय नहीं है। साथ बैठते - बैठते, ध्यान करते - करते शायद कहीं ऐसा एक गहरा स्वाद आ जाए, जिसमे तुम्हें ये निश्चय हो जाए कि तुम्हारे भीतर एक अपार स्रोत है ; जहाँ तुम अजर अमर हो। जहाँ मृत्यु कभी छूती नहीं, जहाँ मौत की परछाई भी नहीं आ सकती।
अपने ही उस केन्द्र में स्थित होते ही एक अजब मस्ती है ; एक अजब अद्वैत निष्ठा। ‘ मैं और परमात्मा दो अलग - अलग अस्तित्व हैं ‘, यह भेद भी खुल जाता है। अद्वैतता के इस निश्चय में आते ही, यह जो मस्ती फ़िर छाती है ; इस मस्ती का क्या ही कहना!
