कृपया मेरी इस क्रोध की अग्नि से मुझे मुक्त करायें, और अपनी ममता भरी शीतल वर्षा द्वारा मेरे मन को शीतल एवं शांत कर दें।
क्रोध की अग्नि से मैं मुक्त नहीं कर सकती। क्योंकि अगर क्रोध तुम्हें सच में अग्नि लगता है तो कोई भी इतना बुद्धू नहीं है की आग में स्वयं को जलाये। ...
यदि हमने ख़ुद को बीते कल की परेशानी में ही उलझाए रखना है, तो नए दिन का क्या लाभ? यदि अपनी इस शक्ति को बीते कल की बातों में ही खर्च करना है, तो उर्जा के इस संचार का लाभ लेने की भी क्या जरुरत है? जितना महत्वपूर्ण इस ऊर्जा को प्राप्त करना है, उससे ...
एक महात्मा किसी के घर में भीक्षा मांगने गए । घर की देवी ने भीक्षा दी और हाथ जोड़कर बोली - ‘महात्मा जी, कोई उपदेश दीजिये।’
महात्मा ने कहा - ‘आज नहीं, कल उपदेश दूंगा। ‘
देवी ने कहा - ‘तो कल भी यहीं से भिक्षा लीजिये।’
दूसरे दिन जब महात्मा भिक्षा लेने के लिये चलने लगे तो ...
वज्रासन में बैठने पर हमारे पाचनतंत्र को बहुत लाभ मिलता है। और ऐसे बैठने पर कामोत्तजना पर नियंत्रण होता है। जब आप यूँ घुटने मोड़कर नितम्बों को पाँव की एड़ी पर टिकाकर बैठते हैं तो शरीर में वज्र नाम की एक नाड़ी है, जिस पर इसका सीधा प्रभाव पड़ता है। और यही वज्र जननांगों, काम ...
ब्रह्मचर्य का अगर हम शाब्दिक अर्थ करें, वह है - जब ब्रह्म में रमण होता है, वह ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य का अर्थ है - चेतना को उच्चतर क्षेत्र में ले जाने के लिए तुम कृतसंकल्प हो और उसके लिए तुम अपने लिए देह में ओज को, उर्जा को सुरक्षित रखते हो और इस ...
शब्दों से तो मैं पता नहीं कितनी बार बोल चुकी हूँ। पर शब्द काफ़ी नहीं है, यह इसी से साबित हो रहा है। इसलिए मैं नहीं बोलूंगी कि तुम कौन हो। क्योंकि जो खोजने निकलेगा, असलीयत में वही पायेगा। लेकिन जो खोजने से डरेगा, वह कुछ भी नहीं पायेगा। तो खोजने से चूको मत। खोजो ! ढूँढो उस निराकार को, जो तुम्हारे ही भीतर है। ढूँढो ! ढूँढो ! उस अरूप परमेश्वर को, जिसके यह सारे ही रूप हैं ।
शिष्य का क्या मतलब है ? शिष्य वह है जो अपने जीवन को उत्कर्ष की और ले जाए, जो मोह और अज्ञान- से अपने आपको बाहर निकालना चाहता है, ऐसे शिष्य को गुरु यदि उपदेश देता है तो उसे कुछ लाभ भी होता है। जिसके जीवन में ऊपर उठने की तमन्ना ही नहीं है और जो न अज्ञान को दूर करना चाहे, उसे गुरु के पास रहने पर भी कोई लाभ नहीं होता...
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानीनस्तत्त्वदर्शिन:
ज्ञान किसको मिलता है ? जो श्रद्धाभाव से शरणागत हो और अपना आप समर्पित करके गुरु के समक्ष कहे कि मुझे ज्ञान दें, तभी तत्व - दर्शन होता है। दूसरी मर्यादा यह कि जब गुरु तुम्हें ज्ञान समाप्त करे माने पूर्णाहुति करें तो शिष्य होने के नाते गुरु - ...
जब सहारा मिलता है, सान्निध्य मिलता है तो ध्यान गहरा जाता है। जब सान्निध्य नही मिलता है जब ध्यान मेरे साथ नही कर रहे होते हो ; अपने आप कर रहे होते हो, तो गिर जाते हो। थोडी ही देर कर पाते हो, ज्यादा देर नहीं कर पाते हो। उतना अच्छा नहीं लगता उतना गहरा नहीं होता। पर इस तरह की बैठकों में बैठते - बैठते, साथ ध्यान करते - करते, फ़िर भीतर सध जाता है। जिस दिन भीतर सध गया फ़िर मैं होऊं या न होऊं; इसमे कोई फर्क नही रह जायेगा।
आज मैं आपको एक प्रयोग देना चाहती हूँ जिससे आप समझ पायें कि आपका मन कितना बिखरा है। क्योंकि कभी - कभी रोगी को भी पता नहीं होता है कि उसे रोग है। तो अब यह ज्ञान तो करना पड़ेगा कि रोग भी है। जिस किसी के पास घर में घड़ी हो, वाल क्लॉक हो ...
जिस दिन मन के विचारों से ज्यादा परेशानी लगने लग जाए उस दिन कह देना कि ‘ आज हमें यह मन की भीड़ स्वीकार, विचारों की भीड़ भी स्वीकार है ‘, तब तुम पाओगे ‘मन तो बहुत कुछ विचार करता है, पर आप परेशान न हों। बस स्वीकार कर लीजिए कि यही मन का शोर स्वीकार है। कहिए कि ‘ मनीराम ! खूब खेल दिखा, आज हम तेरा शोर देखेंगे ‘। इस प्रयोग का नतीजा क्या होगा? यह मैं नहीं बताऊंगी, तुम्हारे ऊपर छोड़ती हूँ...
सूर्य का अर्थ - बुद्धि, सूर्य का अर्थ - ऊर्जा, दोनों है, तो इसका अर्थ यह है कि इस माह में यह जो सूर्य मकर राशि में गया है, इसके प्रभाव शरीर पर और मन पर भी आएँगे। इस विज्ञान को चूँकि सब लोग समझते नहीं हैं, समझना चाहते भी नहीं हैं और समझाने वाले ...
प्रत्येक व्यक्ति को कभी - कभी अकेले रहने का अवसर अवश्य ढूँढना चाहिए ।
आप अपने जीवन को देखो। पूरा समय पति - पत्नी, बच्चे, माता - पिता, भाई - बहन,
मित्र, पड़ोसी, ऑफिस, साथी; इन सबका तुम्हारे आस - पास तांता लगा रहता है। याद रहे,
जितने लोग तुम्हारे आसपास होते हैं, उन सबकी बातें ...
मौन की तीन स्थितियाँ होती हैं। पहली - वाणी का मौन। दूसरी स्थिति - मन का मौन। तीसरी स्थिति में काष्ठ का मौन। पर ये शुरुवात होती है। जो गूंगा है उसको हम मौन में नही कह सकते । गूंगे आदमी के पास बोलने की क्षमता नहीं होती । और उस शक्ति के बावजूद वो निर्णय करे कि 'मैं बात नहीं करूँगा'। प्रश्न ये उठता है कि वो बात क्यूँ नहीं करेगा, किसलिए? आप नाराज हो जाएँ या गुस्सा हो जाएँ तब भी आप चुप हो जाते हैं, दुखी हों, आप तब भी चुप हो जाते हैं । सिर्फ़ चुप हो जाना मौन नहीं है। चुप होने के पीछे कारण हैं। कारण की समझ होनी चाहिए।
"एक दिन में सारे विचारों को नष्ट नहीं किया जा सकता। मानसिक वृत्तियों की प्रक्रिया लम्बी और कठिन है।" जिस प्रकार ईंधन के जल चुकने पर आग अपने स्त्रोत में विलय हो कर शांत हो जाती है, उसी प्रकार सभी संकल्पों और विचारों के समाप्त हो जाने के बाद मन अपने स्त्रोत आत्मा में विलय होकर शांत हो जाता है। तभी परम स्वतंत्रता या कैवल्य की प्राप्ति होती है। एक दिन में सारे विचारों को नष्ट नहीं किया जा सकता...
अजपाजप में हमारे श्वास की जो स्वाभाविक टोन है, उस टोन को पकड़ना है। वह टोन है ' सोहम्'। स्वरयोग में भगवान् शिव ने पार्वती से कहा कि 'सोहम्' श्वास प्राकृतिक ध्वनि है। यह कोई मन्त्र नहीं है जिसे मनुष्य ने रच दिया है। यह हमारे दिमाग की इन्टोनेशन है। उस इन्टोनेशन को आधार बना लें। श्वास भीतर जाने पर ' सो ' श्वास बहार आने पर ' हम् ' । फ़िर इसका काउंटर श्वास भीतर जाए तो 'हम्' , श्वास भर जाए तो 'सो' ; तो 'सोहम्' एक। दूसरा 'हम् सो'।
प्राण का अर्थ है ऊर्जा। इस ऊर्जा से सारा स्थूल, भौतिक जगत हुआ है और इसी प्राण ऊर्जा से यह हमारा स्थूल शरीर भी हुआ है। अगर मनुष्य के शरीर में से एक सैल निकालकर माइक्रोस्कोप में रख कर देखो तो क्या दिखेगा। मॉस , अगर आप मॉस को फ़िर वापिस विघटित करें तो उसमे से निकलेगा एटम । विज्ञान कहता है कि उसमें से ऐसी ऊर्जा निकलेगी जो हमारी समझ के बाहर है।
जब साधक नियमित रूप से ध्यान करता है, तो उसके भ्रूमध्य और आज्ञा चक्र
का स्थान ही क्यों तेजस्वी रहता है?
कारण यह है कि आज्ञा चक्र को चेतना का आसन कहा जाता है। अगर हम यह कहें कि पूरे शरीर में चेतना किस जगह बैठती है? मौजूद तो यह नख से शिख तक हर जगह ...
नाद कहते हैं - ध्वनि को। ध्वनि की तरंग को। आप पहले एक नाद उत्पन्न करो, फिर उस नाद के साथ अपने मन को जोड़ो। उदाहरण है - जैसे ऊँ। जैसे इस शब्द का नाद आपने किया, ध्वनि की, उस ध्वनि को आप अपने कानों से सुनते भी है। जब आप कान बंद करके ऊँ ...
तिब्बत में बौद्धमत में एक ध्यान - साधना का प्रयोग होता है। आप में से जो कोई गहरा प्रयोग करना चाहता है , वह इस सूत्र को ले। पर इसे करने के लिये हृदय में अपार श्रद्धा और अपार साहस चाहिए । कमजोर दिल वाला इसे नहीं कर पायेगा। रात के समय में अपने कमरे में एक शीशा रखें, जिसमें आप अपना सिर देख सकें। आसन लगा कर बैठें, कमरे में केवल मोमबत्ती या एक दीपक जलाएं, और फ़िर उस दीपक की लौ में अपने ही चेहरे को बिना पलक झपकाए, त्राटक लगा कर शीशे में बराबर देखते रहें।
मेरी एक संत मित्र थे विमल। गर्मी के दिन थे और हम लोग गंगा तट पर बैठे हुए थे। बड़ी ठंडी हवा गंगा तट पर बैठने से लग रही थी। यूँ तो बहुत गर्मी थी। अचानक से उसने अपने झोले से आम निकाले और आम उसने गंगा जी में उतार दिए ताकि ठंडे हो जाएँ और जब ठंडे हो गए तो उसने एक मुझे दिया एक स्वयं लिया।उसने आम हाथ में पकड़ा है और आम को देखती जा रही है। देखते देखते उसने कहा...
बुद्ध के शिष्य हुए बोधिधर्म। बुद्ध के शरीर छोड़ देने के बहुत समय बाद बोधिधर्म हुए। वे बुद्ध के ज्ञान का उपदेश देने के लिये चीन की और गए। बड़ा कठिन रस्ता, हिमालय की चोटियाँ, आज भी कोई कहे कि पैदल पार करके वहां चला जाऊँ, तो आज भी दिक्कत। लेकिन बोधिधर्म हाथ में एक डंडा लिये हुए, बस एक वस्त्र पहने हुए, वह माइनस 30 डिग्री की बर्फ पर पैदल चलकर कितनी मुश्किल से वहाँ पहुंचे...
एक दिन सुकरात अपने विद्यार्थियों के साथ बैठे थे और उनकी पत्नी अंदर रसोई में चीख - चिल्ला रही थी। उस समय सुकरात अपने विद्यार्थियों को कुछ समझा रहे थे और सोच रहे थे की यह पाठ्यक्रम खत्म हो जाए, तब अंदर जाता हूँ। लेकिन पत्नी इतनी गुस्से से बाहर आई और सुकरात पर न ...
एक दिन अचानक सिद्धार्थ आधी रात को उठा और घर छोड़ कर चल दिया। सालों कुछ पता भी न चला कि सिद्धार्थ गया कहाँ। पत्नी को नहीं पता कि कहाँ गया। फिर कोई दस-बारह वर्षों के बाद सिद्धार्थ, जो अब तक बुद्ध नाम से प्रसिद्ध हो चुके थे, जब वापिस लौटे, तो पिता को तो ...
किसी भी समय आपको गहरी चिंता होने लगे तो आसान काम है कि अपनी पूरी चेतना को अपने पैर के अंगूठे में ले जाओ । इसको तुम अभी भी कर सकते हो । अगर ऐसा करते हो तो तुम्हारा टेंशन उसी क्षण चला गया । इसे आप कभी भी....... किसी भी समय तुम्हे लगे कि तनाव हो रहा है, तनाव आने लगा है, तनाव आ रहा है, सिर्फ़ अपनी चेतना को पाँव के अंगूठे में ले जाओ और तुम पाओगे कि...
आधुनिक मनुष्य की बहुत सारी मनोवैज्ञानिक आपदायें हैं। न्यूरासिस हैं, फोबिया हैं, मेनिया हैं, डर हैं। और इसके कारण आप एक स्वस्थ जीवन नहीं जी पाते। जैसे अंधेरे से कईयों को डर लगता है, मकड़ी से डर लगता है। किसी - किसी को लाल रंग से डर लगता है। किसी - किसी को तंग जगह में अन्दर जाने से डर लगता है। किसी को ऊंचाई से डर लगता है। वह ऊंचाई पर नहीं जा सकता है। अब ये सब डर , ये सब जो भय हैं , ये भय भी आपकी साधना में बहुत बड़ी रुकावट होते हैं...
ज़िंदगी को जीने का एक मंत्र आज ले लीजिए। निश्चिंत होकर जीओगे तो खूब जीओगे और अगर चिंता करके जीओगे तो जल्दी मरोगे। तो अगर जल्दी मरने का प्रोग्राम हो, तो खूब चिंता कीजिए। रातों की नींद गँवाइए। और अगर लंबा जीना चाहते हैं तो निश्चिंत होकर जीयें ।
मैं काम वासना को उठते हुए देखती हूँ और शरीर और मन पर इसके प्रभाव को भी देखती हूँ। मन को दो भागों में बँटा हुआ देखती हूँ। एक मन कहता है कि जो हो रहा है वह ग़लत है। तब श्वासों को गहरा करने की कोशिश करती हूँ। ऐसा करने से मन में उठ रहा काम वेग कुछ हद तक कंट्रोल में होता है। लेकिन फिर मन दूसरे ही रूप में कुछ और आकर्षण क्रिएट करता है। कई बार मैं मन के बुरे विचारों में इस कदर बह जाती हूँ कि संभलना मुश्किल हो जाता है...
काम ऊर्जा अगर नीचे को बह गयी तो सेक्सुअल रिलीस होगा और यही काम ऊर्जा को अगर आपने ध्यान के द्वारा बदल दिया तो वो तुम्हारे ध्यान को गहरा कर देगी। काम एक ऊर्जा है। इस ऊर्जा को परिवर्तित करना सीखो। जो लोग अपनी इस काम ऊर्जा का सदुपयोग करना नहीं जानते, और उससे लड़ते रहते हैं, वे बड़े ग़मगीन और दुखी आत्माएँ रहती हैं। इसे बदलना सीखो। पर इसे बुरा मत कहो। इसको दबाओ नहीं, इसे समझो...
शिव के ज़हर पीने की घटना हम लोगों के लिए एक संदेश को लिए हुए है। साधक को अपने जीवन के कड़वे, कठोर अनुभवों को, जीवन में अपने ही कर्म के अनुसार प्राप्त हुए दुखों को पीना है, ज़हर पीना है और जिसने ज़हर को भी स्वीकार कर लिया है, सच तो यह है कि उसके लिए ज़हर भी अमृत हो जाता है। और अगर कोई अमृत को भी इनकार कर दे, इनकार कर सकता है, उसके लिए अमृत भी ज़हर हो गया।