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शिव सूत्र
क्रोध ही करुणा लेकिन कब?
कृपया मेरी इस क्रोध की अग्नि से मुझे मुक्त करायें, और अपनी ममता भरी शीतल वर्षा द्वारा मेरे मन को शीतल एवं शांत कर दें।
क्रोध की अग्नि से मैं मुक्त नहीं कर सकती। क्योंकि अगर क्रोध तुम्हें सच में अग्नि लगता है तो कोई भी इतना बुद्धू नहीं है की आग में स्वयं को जलाये। क्रोध अगर सच में अग्नि लग रहा होता तो आप मेरे से पूछते नहीं कि मैं इससे बचूं कैसे? ‘ आप उस क्रोध की अग्नि में नहीं जलें ‘, उसके उपाय ख़ुद कर चुके होते। पर चूँकि तुम ख़ुद नहीं जान पा रहे हो कि किस तरह से अपने - आपको इस ज्वाला से बचा सकें, तो उसके बारे में मैं बात कर सकती हूँ, मैं तुम्हे उपाय दे सकती हूँ। मैं उन विधियों को तुम्हें बता सकती हूँ जिससे तुम क्रोधित न हुआ करो। परन्तु मेरे उपाय बता देने के बाद भी अगर आप उन उपायों को इस्तेमाल नहीं करते हैं तो भी कुछ होने वाला नहीं है।
तुम इस क्रोध से मुक्त होने से पहले यह समझो कि क्रोध आता ही क्यों है। आसान जवाब है - हमने दिमाग में कुछ योजनायें बना रखी होती हैं, जब वे पूरी नहीं होती तब क्रोध आता है। हमने कुछ अपेक्षायें खड़ी करके रखी होती है, जब वे पूरी नहीं होती तब क्रोध आता है। हमने कुछ मापदण्ड बना रखे होते हैं खुशी के लिए, जब वे पूरे नहीं होते तब आप दुखी होते हो। जब आपको क्रोध से या दुःख से बचना है, तो उसका सरलतम उपाय तो यह है कि पहले अपेक्षाओं से स्वयं को मुक्त करो। तुमने कल लिखा था कि तुम नौकरी ढूँढ रहे थे और नौकरी मिल नहीं पा रही, इस कारण तुम्हें निराशा की वजह से गुस्सा आता है। तो जब तुम जान गए हो इतनी बात, तो इसका निदान भी कर सकते हो।
नौकरी को ढूँढ ही क्यों रहे हो? याद रहे, तुम अपनी महत्वाकांक्षाओं के साथ कभी भी संतोष का अनुभव नहीं कर सकते। आज तुम कहते हो ‘ यह नहीं है, यह हो जाए ‘। फ़िर कल कहोगे कि ‘वह नहीं है, वह हो जाए ‘। इसका तो कोई अंत नहीं है। इसलिए तो बात मैंने सार रूप से पहले ही कह दी। विस्तार में जाने की आवश्यकता नहीं है। मैं उम्मीद करती हूँ तुम समझ गए होगे ।
क्रोध से तुम तब तक नहीं बच सकते, जब तक तुम अपनी महत्वकांक्षाओं को छोड़ोगे नहीं। यह तो ऐसे ही कि एक महिला आटा गूंद रही थी, अब आटा गूंदेगी तो हिलेगी, हाथ चलेंगे, मुठियों को आटे के ऊपर दबाएगी ही ……. तो उसकी सास उसको डांटने लगी कि ‘यह कैसे आटा गूंद रही है? हिल क्यों रही है ? हिले बगैर आटा गूंदो। ‘अब हिले बगैर आटा कैसे गूंदा जाए? आटा गूंदोगे तो हिलना होगा ही। ऐसे ही महत्वकांक्षाएं रखोगे, तो क्रोध होगा ही। क्रोध होगा तो दुखी होवोगे ।
महत्वकांक्षा चाहे नौकरी में हो, महत्वकांक्षा चाहे समाधि में हो, ध्यान में हो, महत्वकांक्षा
चाहे ईश्वर के मार्ग में हो, महत्वकांक्षा चाहे संसार के मार्ग में हो, तुम्हारी महत्वकांक्षाएं
ही तुमको दुःख देती हैं।
हम लोग दुखी इसलिए नहीं होते कि हमारे जीवन में दुःख होता है। हम लोग दुखी इसलिए होते हैं कि हमें दूसरो के जीवन में सुख दिखता है और मन में लोभ उठता है कि यह सब मेरे पास क्यों नहीं है। हम अपने दुखों से दुखी नहीं है, हम दूसरो के सुख से दुखी हैं। क्योंकि दूसरे का सुख देखते ही मन में लालच उठता है कि ‘ये इसके पास है मेरे पास क्यों नहीं। यह इसको मिल गया, तो मुझे क्यों नहीं । हमने क्या पाप किए हैं कि हमें नहीं मिला, इसको मिल रहा है।’
यह तो ऐसे ही है एक आश्रम में एक नवयुवक गया और गुरु से कहता है कि गुरु जी ! मेरी बहुत इच्छा हो रही है कि मैं यहीं आश्रम में रहूँ, तो मैं यहाँ के नियम जानना चाहता हूँ कि यहाँ कैसे रहते हैं, यहाँ क्या होता है। ये जो बाकी लोग हैं ये कौन हैं? ‘
गुरु ने कहा कि ‘ ये सब मेरे चेले हैं, विद्यार्थी हैं और मैं इनका गुरु हूँ । इनके गुरु होने के नाते कुछ कर्तव्य मेरे हैं, कुछ इनके हैं। तो अपने - अपने कर्तव्यों को सब पूरा कर रहे हैं । किसी को भोजन बनाना है, किसी को सफाई करनी है, किसी को लिखने का काम करना है, किसी को कोई अभ्यास दिया है, जो वे करते हैं।’
नवयुवक ने कहा कि ‘ थोड़ा और विस्तार से कि आपका क्या काम होता है ? ‘ गुरु ने और अधिक बताया। बोले - ‘मेरा काम है इनको मार्ग दर्शन देना। मेरा काम है इनके साथ बैठना, इनकी समस्याओं को सुनना और उनको सुलझाना। और इनका काम है - जो कुछ मैं इनको कहूँ वो करना । अगर मैं कहूँ कि प्राणायाम करो तो करना। अगर मैं कहूँ कि सेवा करो, तो सेवा करें।’
नवयुवक कहता कि ‘ यह तो बहुत अच्छी जगह लगी। पर मैं आप से पूछना चाहता हूँ कि क्या यहाँ मैं गुरु बनकर रह सकता हूँ? क्योंकि गुरु का काम तो सबसे सहज है - बैठो, बात करो, दर्शन दो, फूल लो, सेवा लो, थोड़ा बात कर लो। बाकी सारा मोटा काम तो चेलों को करना पड़ना है।’
गुरु ने जवाब दिया कि ‘देखो, तुम निश्चित ही गुरु बनकर रह सकते हो, पर इस आश्रम में नहीं । उसके लिये तुम्हे अपना आश्रम बनाना होगा। उसके लिये पहले ख़ुद तुम्हे विद्यार्थी, विद्यार्थी से शिक्षक, शिक्षक से आचार्य, आचार्य से गुरु और जैसे यह सारा क्रम तुम पूरा कर लोगे, उस दिन तुम गुरु कहलाये जाओगे । तब तुम गुरु बनकर बैठ जाना।’
क्रोध एक अग्नि है
जिससे सिर्फ़ अपना
नास होता है, दूसरे
का नहीं।
क्रोध ऊर्जा है, क्रोध को करुणा में बदल सकते हैं। ऊर्जा वही है। वही क्रोध है पर वही क्रोध करुणा का रूप लेकर अमृत जैसा हो जाता है।’ हम अपने क्रोध को करुणा में कैसे बदलें ‘ इस विधि को मैंने बताया है, पर सबसे पहली बात तो यह आती है कि क्या तुम क्रोध से छूटना भी चाह रहे हो? तुम कहो कि मैं अपनी महत्वकांक्षा को भी बनाये रखूं और क्रोध से भी छूट जाऊँ तो यह नहीं हो सकता ।
दो बातें सिर्फ़ कहती हूँ कि आप अपनी खुशी को बाहर किसी विशेष स्थिति में सीमित न करें। और आप दूसरों को मत देखें। अगर ये दो काम कर सकें तो आप बहुत आनंद से रह सकेंगे। नहीं तो किसी नौकरी में रहो, किसी भी डिपार्टमेन्ट में रहो, अंतत: दुखी ही रहोगे। जब तक दूसरों को देखते रहोगे, जब तक महत्वकांक्षाओं में रहोगे, दुखी रहोगे।
जीवन का मजा यह है
कि आप अपनी खुशी
को बाहर किसी विशेष
स्थिति में सीमित न करें ।
और आप दूसरों
को मत देखो ।
जीवन का मजा यह है कि आप अपने कार्य करते है, आप अपने काम बहुत अच्छे ढंग से करते हैं, बुद्धि को लगाते हैं, शरीर से श्रम करते हैं, और श्रम करने में आनंद होता है, चीजों में आनंद नहीं होता। पदवियों में अपने आनंद को नहीं ढूँढते, कि ‘ यह पदवी होगी तो आनंद होगा’, ‘ यह पदवी नहीं होगी तो आनंद नहीं होगा ‘; ‘ जिस दिन मैं यह बन जाऊँ तभी आनंद मिलेगा ‘, ‘यह नहीं होगा तो सुख नहीं होगा ‘; अब अगर इस तरह की शर्तों के साथ तुम जीओगे तो दुखी ही रहोगे।
याद रहे, क्रोध वह अग्नि है जिससे सिर्फ़ अपना नास होता है, दूसरे का नहीं। दूसरे का अगर आपके क्रोध के कारण जरा सा नास होता है तो याद रहे, आपकी शामत आई। वह उतने ज़ोर से आपसे बदला ले लेगा। जब भी आप कभी अपने क्रोध को दूसरों के ऊपर फेंकते तो सामने वाला भी कोई महावीर या बुद्ध नहीं है, सामने वाला भी आपके जैसा ही है। आपके किए वार का बहुत उचित जवाब दे देगा। अगर आपसे बड़ा है तो उसी समय दे देगा, अगर आपसे छोटा है तो मौके की तलाश करेगा, जब वह बड़ा हो जाएगा बदला ले लेगा। तो एक दूसरे को हम नाहक पीड़ा देते हैं ।
सबसे बड़ी बात तो यह है कि दूसरों को भूल जाइए। इससे आप स्वयं को पीड़ा देते हैं। इस बात को स्वीकार करके लो कि मुझे क्रोध से सच में बाहर आना है और महत्वकांक्षा को छोड़ना है ।
