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बौद्धमत साधना प्रयोग

Do it

जिस शरीर को आप “मैं” जानते हो, ‘ मेरा ‘ जानते हो, और चूँकि
इस देह को अपनी पहचान मानते हो फ़िर इसी शरीर के माता – पिता,
भाई – बंधुओं को अपना जानते हो सच तो यह है की यह
तुम्हारा है ही नहीं। फ़िर जब ये तुम्हारी देह ही नहीं तो फ़िर
यह पति, पत्नी, माँ – बाप कहाँ तुम्हारे?

तिब्बत में बौद्धमत में एक ध्यान – साधना का प्रयोग होता है। आप में से जो कोई गहरा प्रयोग करना चाहता है , वह इस सूत्र को ले। पर इसे करने के लिये हृदय में अपार श्रद्धा और अपार साहस चाहिए । कमजोर दिल वाला इसे नहीं कर पायेगा। रात के समय में अपने कमरे में एक शीशा रखें, जिसमें आप अपना सिर देख सकें। आसन लगा कर बैठें, कमरे में केवल मोमबत्ती या एक दीपक जलाएं, और फ़िर उस दीपक की लौ में अपने ही चेहरे को बिना पलक झपकाए, त्राटक लगा कर शीशे में बराबर देखते रहें।

बिना पलक झपकाए, दस मिनट, पन्द्रह मिनट, बीस, तीस मिनट जितनी देर देख सको, देखो देखे चले जाओ। बीच – बीच में एक संकल्प कि जैसा यह है वैसा रहेगा नहीं। जिन लोगों ने यह प्रयोग किया उन्होंने पाया कि कुछ देर बाद बराबर देखते रहने से शीशे में अपना ही प्रतिबिम्ब बदलने लग जाता है। और रूप ऐसे बदलता है कि आदमी हैरान होता है कि अभी क्या दिख रहा था और अब क्या दिख रहा है । कुछ लोग तो डर के मारे छोड़ देते हैं, कर ही नहीं पाते। अगर इसे बराबर तीन महीने तक कोई करता रहे, श्वास विपसना में रहे, तीन महीने तक विपसना बराबर करने से इसका प्रतिफल ये होगा कि वह अपने ही पूर्व के जन्मों की शक्लों को देख पाएगा।