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नाद अनुसंधान


नाद कहते हैं – ध्वनि को। ध्वनि की तरंग को। आप पहले एक नाद उत्पन्न करो, फिर उस नाद के साथ अपने मन को जोड़ो। उदाहरण है – जैसे ऊँ। जैसे इस शब्द का नाद आपने किया, ध्वनि की, उस ध्वनि को आप अपने कानों से सुनते भी है। जब आप कान बंद करके ऊँ का गुंजन करें, तो ऊँ का उच्चारण करने से इस शब्द की चोट से शरीर के किन-किन हिस्सों में खास प्रभाव पड़ रहा है, उसको ध्यान से देखें। अगर आप गौर करें तो कानों को अंगूठे या पहली अंगुली से बंद करें और ऊँ का भँवरा गुंजन करें तो उसका सबसे अधिक प्रभाव गालों में, मुँह में, गर्दन में पड़ेगा।

अनुसंधान माने – खोज करनी। फिर आप देखें कि कानों के पिछले हिस्से में, और अधिक ध्यान से देखेंगे तो नाक पर, अगर आपके देखने का दायरा और बढ़ता चला जाएगा तो आप देखेंगे कपाल में, सिर में आप इन तरंगों को महसूस करेंगे। इस नाद की तरंगों का पीछा करना और यह नाद कहाँ से निकल रहा है, उसका भी पीछा करना और इस नाद की तरंगें कहाँ-कहाँ जा रही हैं, उसको बहुत ध्यान से देखना। यही नाद-अनुसंधान है। कहीं कहीं इसको नाद योग भी कहा जाता है।

108 प्रधान उपनिषदों में से नाद-बिंदु एक उपनिषद है, जिसमें बहुत से श्लोक इस नाद पर आधारित हैं। नाद क्या है, नाद कैसे चलता है, नाद के सुनने का क्या लाभ है, इन सब की चर्चा इसमें की गयी है। नाद को जब आप करते हो तो यह है इसकी पहली अवस्था।

दूसरी अवस्था है जहाँ नाद करोगे नहीं, सिर्फ़ अपने कानों को बंद किया और भीतर सूक्ष्म ध्वनि को सुनने की चेष्टा करना। यह सूक्ष्म ध्वनि आपके भीतर हो रही है। पर तुम्हारा मन इतना बहिर्मुख है, बाहरी स्थूल शब्दों को सुनने में तुम इतने व्यस्त हो कि तुम्हारे भीतर जो दैवी शब्द हो रहे हैं, तुम उनको सुन भी नहीं पा रहे। कहाँ से ये शब्द उत्पन्न हो रहे हैं, ये शब्द सुनाई भी पड़ रहे हैं या नहीं, तुम्हे कुछ नहीं पता। यह ध्वनि बहुत ही सूक्ष्म है।

कबीर साहब और दूसरे रहस्यदर्शी संतों ने इसको श्रेणीबद्ध करके कहा है कि शुरु-शुरु में झींगुर की आवाज़ जैसा शब्द सुनाई पड़ता है। फिर धीरे-धीरे जैसे बीन बज रही हो, फिर धीरे-धीरे ढोल जैसी थाप सुनाई देने लग जाएगी, फिर यह ध्वनि शंख जैसी हो जाएगी।

तुम अपने ही दिल की धड़कन सुनने लग जाओगे। प्रति मिनट 70 बार, अभी तुम्हें कुछ भी खबर नहीं कि धड़कन है या नहीं है। डॉक्टर आपकी हार्ट बीट किसी यंत्र से चेक करे तो वह बताएगा की कम है या ज़्यादा। पर तुम्हें कुछ नहीं पता। है न अजीब बात, शरीर जब कि तुम्हारा है, तुम्हारा दिल है, तुम्हें मालूम होना चाहिए। रक्त का प्रवाह जो नसों में चल रहा है, यह भी सुनाई देने लग जाएगा। पर इसके लिए मन का एकाग्र और शांत होना चाहिए।

नाद-योग गहरी साधना है। नाद-योग की साधना वही कर पाएँगे जो लोग पहले भ्रामरी, ऊँकार के गुंजन से भी पहले ऊँ के उच्चारण का अभ्यास करें। फिर ऊँ का गुंजन हो। इसके साथ ही साथ योगनिद्रा चल रही हो तो धीरे-धीरे तीन से चार महीने में अथवा छह महीने में अगर आप इसे ईमानदारी से करते रहेंगे, तो छह महीने में आप नाद-योग की साधना कर सकेंगे। उसके पूर्व संभव नहीं है और उससे पहले तुमसे होगा भी नहीं और कोशिश भी मत करना। क्योंकि जब होगा नहीं तो निरुत्साहित हो जाओगे।

ऊँ किसी शब्द का नाम नहीं है। ऊँ एक ध्वनि है, जो किसी ने बनाई नहीं है। यह वह ध्वनि है जो पूरे कण-कण में, पूरे अंतरिक्ष में हो रही है। बाइबल, नानक की वाणी इसकी गवाह है और वह यह कहते है कि ईश्वर ने सबसे पहले शब्द बनाया है।