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शिव सूत्र
साधक का मस्तिष्क तेजस्वी क्यों
जब साधक नियमित रूप से ध्यान करता है, तो उसके भ्रूमध्य और आज्ञा चक्र
का स्थान ही क्यों तेजस्वी रहता है?
कारण यह है कि आज्ञा चक्र को चेतना का आसन कहा जाता है। अगर हम यह कहें कि पूरे शरीर में चेतना किस जगह बैठती है? मौजूद तो यह नख से शिख तक हर जगह है। पर बैठती किस जगह है? वह जगह आज्ञा चक्र है। इसी कारण से जब भी किसी व्यक्ति का ध्यान गहरा होगा या उसका आत्मचिंतन बढ़े या उसकी चेतना उर्ध्वगामी होने लग जाए, शक्ति का जागरण होने लग जाए, तो वह सब इसीलिए हो रहा है कि कहीं न कहीं उसका आज्ञा चक्र तरंगित हो रहा है, कहीं न कहीं चेतना जो तरंगे दे रही है, दे तो यहीं से रही है। आज्ञा चक्र, भ्रूमध्य उसका भौतिक स्थान है।
अगर भौतिक स्पर्श करें तो हम भ्रूमध्य के स्थान को तो छू सकते हैं, पर आज्ञा चक्र में स्पर्श नहीं कर सकते। क्योंकि आज्ञा चक्र जो है, वह मनुष्य की खोपड़ी के अंदर है। रीढ़ की हड्डी के सिरे पर है। और वहाँ तलक ना तुम्हारी अंगुली पहुचती है, ना तुम्हारी आँखें देख सकती है। वह अंधकार नुमा जगह, इतनी जटिल, कि अगर किसी मरे हुए इंसान की खोपड़ी आपके सामने खोल दें, तो भी नहीं पहचान पाओगे तुम।
उसके लिए पूरी एक शोध है, पूरी विद्या है, जिसमें आप फिर पहचान कर पाएँगे कि आज्ञा चक्र की सही जगह यह है। पर मृत व्यक्ति में तो यह कार्य ही नहीं कर रहा, तो उसकी पहचान करना और भी कठिन हो जाता है। जड़ आज्ञा चक्र को देख कर आप उसके वास्तविक कार्य या जब वह जाग्रत होता है, तो कैसा होता है, इससे अवगत नहीं हो सकते। मनुष्य की आँख से तो देखना संभव है ही नहीं।
इसलिए तंत्र में, योग में जब आप धारणा करते हैं, तो भ्रू-मध्य की धारणा कर सकते हैं। आज्ञा चक्र की कैसे करोगे? आज्ञा चक्र के स्थान को अपनी संवेदनशीलता या कल्पना से उसकी जगह से ढूँढने की कोशिश करते हैं। क्योंकि भ्रू-मध्य का स्थान दर्शनीय है, स्थूल है, दिखता है, महसूस भी होता है। इसलिए इस पर कार्य करना बड़ा सरल हो जाता है। दूसरे, जैसे जैसे किसी की बुद्धि तेजस्वी होती है, जैसे जैसे अंतःकरण की शुद्धता, और मन का निर्मल होना, और नज़र का साफ होना प्रारंभ हो जाता है, उतना ही उसका कपाल चमकने लगता है।
इसीलिए लोगों के मात्र चेहरे देखकर, हम बता सकते हैं कि उनके अंदर, कितनी निम्न चेतना है, कितनी निकृष्ट बुद्धि है और कितनी नकारात्मकता के साथ लोग जी रहे है। क्योंकि अंधों के लिए तो सब अंधेरा है, पर आँख वाले के लिए अंधेरे में भी रोशनी होती है। तो यह निर्भर करता है, क्या आप के पास वह नज़र है, जिससे आप देख सकें? तो हमारे पूरे शरीर में हमारा सिर सबसे महत्वपूर्ण है। दूसरा, मनुष्य की जो आँखें हैं, वह मस्तिष्क का ही एक भाग है; वह भाग जो दिखाई दे रहा है। इसी कारण से मनुष्य की आँखों को पढ़ो, तो उसका दिमाग़ भी पढ़ा जाता है। इसलिए सूझवान लोगों ने, समझदार लोगों ने किसी व्यक्ति के बारे में गहरी जानकारी लेनी हो, तो ज्योतिषी की तरह उसकी जन्मपत्री नहीं खोलेंगे, उनको उसका सिर्फ़ चेहरा और चेहरे में भी सिर्फ़ आँखें भर देखनी है।
आँखों के बाद जहाँ उनकी दृष्टि जाएगी, वह है उसके मस्तक पर। उसके मस्तक को देख कर, उसकी आखों को देख कर, उसकी पूरी अध्यात्मिक साधना अगर है तो भी, और अगर वह झूठा दावा कर रहा है कि यह है मेरे में, वह भी और अगर पूरा ही झूठ है वह इंसान तो भी, मस्तक से स्पष्ट हो जाता है। इसलिए गुरु को मूर्ख बनाना आसान नहीं ।जो लोग सोचते हैं कि गुरु को मूर्ख बना सकते हैं, वे खुद सबसे बड़े मूर्ख होते हैं।
व्यक्ति का मस्तक और व्यक्ति की आँखें, ये उसके पूरे चरित्र का और उसके अवचेतन मन का दर्पण होता है, और इस दर्पण से सब दिखता हैं मनुष्य मन के तल पर कई चालें चल सकता है। आपके अंदर गुस्सा है, आप नहीं दिखाओ, आप के अंदर द्वेष है, आप नहीं दिखाओ। लेकिन कब तक रोकोगे? कहीं न कहीं वह निकल जाएगा। आपने बहुत कोशिश करके अपनी साधू की छवि बनाई, बहुत गंभीर साधक हैं, बहुत समझदार हैं, पर आपकी बेवकूफी कहीं न कहीं से छलक ही जाएगी; क्योंकि यही तो शक्ति है अवचेतन मन की। और यह चेतन मन से बहुत ज़्यादा ताक़त रखती है।
सच तो यह है चेतन मन की जो ताक़त है, वह शायद अवचेतन मन की ताक़त का, एक अंश का भी हज़ारवाँ, करोड़वाँ अंश होगा। और जो अवचेतन मन है, वह बहुत बड़ा, विस्तृत और शक्तिशाली है। मनुष्य का जो आचरण है वह सारा चेतन मन से आ रहा है ना कि अवचेतन मन से। अवचेतन मन भीतर से प्रेरणा देता है। इसलिए जैसे तुम्हारे विचार होते हैं, वैसा तुम्हारा आचरण होगा। लेकिन इसमे पूरी बेईमानी करने की संभावना है कि विचार के प्रतिकूल आप अपना आचरण बना लो। लेकिन अवचेतन मन की जो शक्ति है, उसके कारण से कहीं न कहीं, कभी न कभी विस्फोट हो जाता है, और आदमी की असलीयत बाहर आ जाती है।
मेरे हाथ में यह एक फूल है; इसको आप यहाँ रखो, तो भी फूल ऐसा है। इसको मुंबई भेज दोगे, तब भी यह ऐसा है। ठंडक में रखे कि गर्मी से यह मरे नहीं, इसको अमरीका में भेजें, अगर सही हालत में इसको रखा जाए, तो वहाँ पर भी यह ऐसा ही है। यह नहीं कि यहाँ यह फूल है, मुंबई जाते हुए में काँटा हो जाएगा, या अमेरिका जाते हुए में यह सफेद फूल न होकर, लाल फूल हो जाएगा। ऐसा कुछ नहीं, यह जैसा है वैसा ही रहेगा ।
पर मनुष्य का मन ऐसा नहीं है। मनुष्य का मन हर घड़ी रंग बदलता है और पैंतरे बदलता है। अब यह जो बदलाहट होती है, यह सबसे पहले आपकी आखों में और आपके चहरे पर दिख जाती है। जो व्यक्ति बदल रहा है, वह चाहे स्वयं इस परिवर्तन को न देख पाए, लेकिन जो कोई उसके आसपास ज्ञानी है, वह देख ही लेगा ।
इसलिए कहा गया संत के सामने, सदगुरु के सामने तुम नंगे होते हो। तुम छिपाना भी चाहो अपने आप को, तो भी छिपा नहीं सकोगे। आदमी सोचता है कि वह बहुत चालाक है, पर उसकी चालाकी जो है, सदगुरु के सामने जाकर फेल हो जाती है। वह बात अलग है, सदगुरु बहुत कुछ देख कर भी बहुत कुछ नहीं कहता। क्योंकि उसे यह पता है कि हर आदमी अपने अंदर अहंकार लेकर घूम रहा है। गुरु के मुख से भी कठोर बात सुनना अच्छा नहीं लगता है।
अब यह तो कभी-कभी……… बहुत कम ऐसा अवसर होता है, किसी का समर्पण पूरा हो जाए, और गुरु आज़ादी के साथ बिना इस भय कि मेरे कठोर होने पर, यह अपने अहंकार के घायल होने पर भाग न जाएगा; गुरु कुछ कहता है. वह भाग न जाए और जाग जाए, इसलिए बड़े धैर्य से और चुप्पी से गुरु को काम करना पड़ता है। गुरु का काम बड़ा कठिन है।
पर हमारी बुद्धि, ज्ञान और आंतरिक जीवन का पूरा पूरा ब्यौरा हमारे चहरे, और विशेष कर हमारे कपाल, यह जो मस्तिष्क है, यहाँ पर परिवर्तन आता भी है और दिखता भी है। दोनों बातें हैं। इसीलिए गुरु के सामने नतमस्तक हुआ जाता है। हम यह नहीं कहते कि ‘हमने सिर या शिखा का भाग गुरु के आगे झुकाया’। हम कहते हैं कि ‘हमने मस्तक झुकाया’, क्योंकि इसी मस्तक में तुम्हारा अभिमान है, इसी मस्तक में तुम्हारी बेहोशी है, इसी मस्तक में तुम्हारा तमस है, और यह गुरु को समर्पित किया जाता है।
इसीलिए जहाँ तुम्हारा ज्ञान थोड़ा गहरा होने लग जाएगा, सबसे पहले मस्तिष्क के स्थान पर ही विभिन्न स्पंदन महसूस होने लग जाते हैं। तरंगे उठती हुईं भी महसूस होने लग जाती हैं। पूरी जगह जैसे सक्रिय हो जाती है। विद्युत किरणें फूटने लगती हैं, पूरा सिर जैसे एक प्रकाश का पुंज हो जाता है। तो यह एक वैचारिक बात नहीं हैं, यह बहुत शारीरिक तल पर घटना घटती है और आपके शरीर में भी परिवर्तन आ जाता है।
‘असतो मा सदगमय’- मेरे इस अंधकार को दूर करो। मेरे मस्तिष्क को प्रकाशपूर्ण बनाओ, मेरा तमस दूर हो। ‘ पुराने अवतारों के, गुरुओं के जो चित्र बनाए जाते हैं, उन सब के पीछे, सिर के पीछे गोल चक्र ऊर्जा का, रोशनी का बनाया जाता, जिसमें से किरणें फूट रही हैं । यह भी उसी बात का चिन्ह है, उसी बात को दिखाने की कोशिश की जा रही है। हाथ में नहीं दिखाया जाता, पैर में नहीं दिखाया जाता, सिर्फ़ सिर के पीछे दिखाया जाता है। क्योंकि चेतना का स्थान मस्तिष्क में, और मस्तिष्क में भी, जो आज्ञा चक्र का स्थान है, यह पूरा केंद्र है, जहाँ से चेतना कार्य करती है।
इसीलिए यह शरीर का सबसे महत्वपूर्ण अंग भी है। जब अज्ञान होता है, यहाँ तो भी, और जब ज्ञान हो जाए, इसमें तो भी, दोनों स्थितियों में, कार्य यहीं से हो रहा है। अगर किसी की चेतना कम स्तर की है, और दबा हुआ क्रोध और उभरा हुआ अहंकार हो, तो भी उसके चिन्ह कपाल में, मस्तिष्क में दिखते हैं। और साधना से धीरे-धीरे उभरा हुआ अहंकार झुकता है, चेतना का तल उठता है। उसके भी फिर जो गहरे परिणाम हैं, वह शरीर में दिखाई पड़ते हैं। इसलिए व्यक्ति का जो चेहरा है, वह इस बात का ठोस प्रमाण बन सकता है कि यह व्यक्ति उन्नत चेतना का है या कपटी है, क्रोधी है, या अहंकारी है, कि ज्ञानी है, कि समर्पित प्रेमी है। यह सब यहीं से दिखता है।
इसलिए मस्तिष्क की बड़ी महिमा है। मस्तक में भी अगर हम खास जगह ढूँढते हैं तो वह आज्ञा चक्र है। यह सबसे महत्वपूर्ण चक्र है। शरीर के संचालन की दृष्टि से भी अगर देखा जाए तो भी यह सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहीं से सब रसायनों का स्राव होता है, यहीं से पूरे शरीर के अंग प्रत्यंग का संचालन होता है। यह आपकी भावनाओं, विचारों का संचालक है। यहीं सब विचार घटित होते हैं। तो जितना लोग सहज समझते हैं, अध्यात्म को, देखा जाए तो यह इतना सरल है नहीं । यह गहरा और कठिन कार्य है। जिसमें अतीव खोज, धैर्य और समर्पित भाव से कोई कार्य करे, तब तो परिवर्तन होने की संभावना है, नहीं तो अभिमान तो इंसान किसी भी चीज़ का कर सकता है। तो फिर वह इस चीज़ का भी अभिमान कर लेता है कि ‘हम बड़े खोजी हैं।’ खोजा कि नहीं खोजा, पर कई दफे खोजने का भी बड़ा अभिमान ले लेता है।
पर अपना साक्षी स्वयं होना चाहिए; कितने बार आप कठोर होते हैं, कितने बार आप फिर स्वार्थी होते हैं, कितने बार आप शरीर भाव में आते हैं, कितने बार आप द्वेष करते हैं, कितने बार आप अशुद्ध विचार और अशुद्ध आचरण रखते हैं, इस पर निरंतर दृष्टि देना बड़ा ज़रूरी है। देते-देते, बढ़ते-बढ़ते, गिरते-उठते, गिरते-पड़ते, कभी तो सीधे व सक्षम होकर मार्ग पर चलने लग जाओगे। पर उसके जो प्रभाव हैं, वे निश्चित शरीर पर आ जाते हैं। दुनिया में करोड़ों, अरबों बुद्ध की प्रतिमाएँ बनीं हैं, एक भी प्रतिमा में उनके चहरे पर चिंता, दुख या पीड़ा नहीं है।
अरबों चित्र और प्रतिमाएँ कृष्ण की बनी हैं; कहीं पर भी, किसी एक जगह पर भी, वह अहंकार या रोष का प्रदर्शन करते हुए नहीं दिखते। चाह करके भी यह फूल काँटा नहीं हो सकता अब। अब यह फूल, फूल ही रहेगा। ऐसे ही साधक को अपने आप को, अपने मन को अपरिवर्तनीय बनाने की चेष्टा करते रहना चाहिए। रजोगुण और तमोगुण के प्रभावों से अपने आप को बड़ी सावधानीपूर्वक बचाना चाहिए। अभी रजोगुणी हो गये, अभी सतोगुणी हो गये, अभी ठंडे हो गये, अभी गरम हो गये। यह जो बदलती हुई रेखाएँ आती हैं दिमाग़ पर, यह तुम्हारे चेहरे को बिगाड़ देती हैं। तुम्हे दर्शनीय नहीं रहने देतीं ।
एक संत तो हमेशा दर्शनीय होता है, दर्शन के योग्य होता है। कारण, उसका ज्ञान और उसकी ऊर्जा उसके मस्तक, उसके कपाल, उसके चेहरे, उसकी आँखों, उसके हाव-भाव में दिखती है, बहती है। इसीलिए कहा, संत का दर्शन करें कि शायद उसे देखकर वह सब बातें समझ में आ जाएँ, जो वैसे सुनने पर समझ नहीं आ रहीं। साधक को उसकी उपस्थिति में रह कर, धीरे धीरे इन्हें आत्मसात करे कि ऐसा होना चाहिए, और वह खुद कैसा है, यह भी देखते रहना चाहिए ।








